chevron_left  तेषामाय़च्छतांarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तेषामाय़च्छतां सङ्ख्ये परस्परमजिह्मगैः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
तेषामिति ह मन्यामो दृष्टतेजोवला हि ते ||
५९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामिदानीं के लोका द्रष्टुमिच्छामि तानहम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
तेषामिमं प्रवक्ष्यामि धर्मकर्मफलोदय़म् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तेषामिषूनथास्त्राणि वेगवन्नतपर्वभिः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्भुवि |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
तेषामुत्कर्षमुद्रेकं वक्ष्याम्यहमतः परम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तेषामुत्पततां कांश्चित्पतितांश्च पराङ्मुखान् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
तेषामृद्धिरतीवाग्र्या गतौ वाय़ुसमाश्च ते |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामृद्धिर्वहुविधा दृश्यते दैवमानुषी |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
तेषामृषिकृतो धर्मो धर्मिणामुपपद्यते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठास्ते चैवानन्यदेवताः |
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेकैकशः पूजा कार्येत्येतत्क्षमं हि नः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
तेषामेकैकशो वीर्यं षण्णां त्वमनुचिन्तय़ |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेको महानासीत्सर्वमल्लान्समाह्वय़त् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेतमभिप्राय़ं चतुर्णामुपलक्ष्य सः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेतमभिप्राय़माचचक्षे स्मय़न्निव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय़ पुरुषर्षभः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
तेषामेतानि लिङ्गानि दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तेषामेते महामात्राः किराता युद्धदुर्मदाः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
युधिष्ठिर उवाच
तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसङ्करे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तेषामेव कृतो भागो मालवाः शाल्वकेकय़ाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
तेषामेव प्रभावेन प्रविष्टोऽहमलक्षितः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
पृथिव्यु उवाच
तेषामेव प्रभावेन सहस्रनय़नो ह्यसौ |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेव महावीर्यः कश्चिदेव पुरःसरः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
तेषामेवं प्रवृद्धानां सर्वेषामसुरद्विषाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
तेषामेवं विनष्टानां स्वर्गे वासो न विद्यते |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
तेषामेवात्मनात्मानं दर्शय़त्येष हृच्छय़ः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
तेषामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं महत् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तेषामय़ं वलवान्निश्चय़श्च; कुरुक्षय़ार्थे निरय़ो व्यपादि ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषामय़ं शत्रुवरघ्न लोको; नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तेषामय़ुगपद्भावे उच्छेदो नास्ति तामसः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तेषु कर्मनिसर्गश्च सर्वतत्त्वार्थनिश्चय़ः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
तेषु कालपरीतेषु विनश्यत्सु च भारत |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
तेषु किञ्चित्प्रभग्नेषु विमुखेषु सपत्नजित् |
१०५ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु कृष्णा महावाहो कथं नु विचरिष्यति ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
तेषु कौन्तेय़ रज्येथा येष्वतन्द्रीकृतं मनः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
तेषु चेदहितं किञ्चिन्मन्त्रय़ेय़ुरवुद्धितः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु गृहीतार्घेषु भारत |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारदः |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु विराटः पृथिवीपतिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु व्राह्मणेषु समन्ततः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु स तु राजा महामतिः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोऽभिव्यराजत |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तेषु तत्सत्रमुपासीनेषु तत्र श्वाभ्यागच्छत्सारमेय़ः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
तेषु तद्धर्मनिक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः |
१९ क