द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
वय़ं द्रोणं पुरस्कृत्य सर्वशस्त्रभृतां वरम् |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
वय़ं द्वादश वर्षाणि युष्माभिर्द्यूतनिर्जिताः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं धर्मं न जानीमस्तिर्यग्योनिं समाश्रिताः ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वय़ं परमसंहृष्टाः पाण्डवाः शोककर्शिताः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वय़ं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ||
८७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
वय़ं पार्थान्हनिष्यामो भीष्मद्रोणपुरःसराः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
वय़ं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसंमितैः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
जय़द्रथ उवाच
वय़ं पुनः सप्तदशेषु कृष्णे; कुलेषु सर्वेऽनवमेषु जाताः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
वय़ं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय़ महीमिमाम् |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
वय़ं प्रतिजिगीषन्तस्तत्र तान्समभिद्रुताः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
वय़ं प्रतिनदन्तश्च तदासीत्तुमुलं महत् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
वय़ं प्रतिनदन्तस्तानभ्यगच्छाम सत्वराः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
भीम उवाच
वय़ं प्रध्वंसय़िष्यामो निघ्नमाना वरान्वरान् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं भीष्मस्य कुर्मेह प्रेतकार्याणि फल्गुन ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं मृगा द्वैतवने हतशिष्टाः स्म भारत |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं राज्यमनुप्राप्ताः पृथिवी च वशे स्थिता ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं राष्ट्रस्य गोप्तारो रक्षितारश्च राक्षस |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं वधेन जीवामः कपालं व्राह्मणैर्वृतम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
वय़ं वध्यामहे चापि शत्रुभिस्तमसावृते |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
वय़ं वा त्वां पराजित्य प्रीतिं दास्यामहे पितुः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
वय़ं वा राज्यमिच्छामो घातय़ित्वा पितामहम् |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वय़ं विनिकृता राजन्सदा गाण्डीवधन्वना |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
वय़ं व्यवसितं पार्थं वज्रपाणिमिवोद्यतम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
वय़ं शेषान्हनिष्यामस्त्वय़ैव परिरक्षिताः ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
वय़ं श्वेतहय़ाद्भीताः कुन्तीपुत्राद्धनञ्जय़ात् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
वय़ं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः |
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
वय़ं सर्वे सहामात्याः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
वय़ं सिद्धमशिष्यामो भवान्साधय़तामिदम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
वय़ं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं हि क्षत्रिय़ा राजन्पाण्डोः पुत्रा महात्मनः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि क्षुधिताश्चैव धर्माद्धीनाश्च शाश्वतात् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं हि तान्गुरून्हत्वा ज्ञातींश्च सुहृदोऽपि च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
वय़ं हि त्वां समाश्रित्य भीष्मं चैव पितामहम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
वय़ं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं हि धार्तराष्ट्राश्च कालमन्युवशानुगाः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं हि पुत्रा भवतो यथा दुर्योधनादय़ः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
नाग उवाच
वय़ं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
वय़ं हि मानं तव वर्धय़न्तः; पृच्छाम भद्रे प्रभवं प्रभुं च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
वय़ं हि वाहुवलिनः कृतविद्या मनस्विनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
वय़ं हि वृद्धाश्चरितव्रताश्च; वेदप्रभावेन प्रवेशनार्हाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
वय़ं हि व्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
वय़ं हि शक्ता धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिणः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान्परान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि सृष्टा भगवंस्त्वय़ा वै प्रभविष्णुना |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रिय़ः |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
वय़ः प्राप्य परिक्षित्तु वेदव्रतमवाप्य च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
वय़ःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
वय़ःस्थां च महाप्राज्ञ कन्यामावोढुमर्हति ||
११६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
वय़ःस्थय़ा तय़ा राजन्सह संवत्सरोषितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
वय़मक्षाः सुदुर्वुद्धे तव वासो जिहीर्षवः |
१५ क