द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यत्समादाय़ सात्वतं प्रत्यविध्यत ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यन्महाराज जग्राहारिविदारणम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो वलम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो वलम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
धनुरस्याच्छिनच्चित्रं हस्तावापं च वीर्यवान् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
धनुराजगवं नाम शराः शृङ्गोद्भवाश्च ये |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरादत्त तद्दिव्यं शरवर्षं ववर्ष च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरादाय़ कौन्तेय़ः प्राद्रवद्भ्रातृभिः सह ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरादाय़ गाण्डीवं देवदत्तं च वारिजम् ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
धनुरादाय़ तत्राहं नाशकं तस्य पूरणे |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
धनुरादाय़ वाणं च तदान्वसरत प्रभुः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरादाय़ संहृष्टो व्राह्मणं प्रत्यभाषत |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
धनुरुद्यम्य कौन्तेय़ो व्यलोकय़त तद्वनम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् |
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
धनुरेकेन चिच्छेद हसन्राजन्महारथः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
धनुरेकेन भल्लेन हस्तावापं च पञ्चभिः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
धनुरेकेषुणाविध्यत्तत्राक्रुध्यद्द्विजर्षभः ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्गाण्डीवमादाय़ तथाक्षय़्यौ महेषुधी ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
धनुर्गृहीत्वा नवमं भारसाधनमुत्तमम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
धनुर्गृहीत्वा यन्तारं लव्धसञ्ज्ञोऽव्रवीदिदम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
धनुर्गृह्य महाराज विव्याध तनय़ं तव ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ग्रहा हि ये केचित्क्षत्रिय़ा युद्धदुर्मदाः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्ग्राहश्चार्जुनः सव्यसाची; धनुश्च तद्गाण्डिवं लोकसारम् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ग्राहो दुर्मदश्च तथा सत्त्वसमः सहः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
धनुर्घोरं रामदत्तं गाण्डीवात्तद्विशिष्यते |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
धनुर्घोषेण वित्रस्ताः स्वे परे च तदाभवन् |
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ज्यां विततां पाण्ड्यश्चिच्छेदादित्यवर्चसः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ज्यातलशव्दश्च गगनस्पृक्सुभैरवः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ज्यामच्छिनत्तूर्णमुत्स्मय़न्पाण्डुनन्दनः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्धरा मांसहेतोर्मृगाणां; क्षय़ं चक्रुर्नित्यमेवोपगम्य ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्धराः श्रेष्ठतमाः पृथिव्यां; पृथक्चरन्तः सहिता वभूवुः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
धनुर्धराणां प्रवरः सर्वेषामेकपूरुषः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
धनुर्धराणामेकस्त्वं पृथिव्यां प्रवरो नृषु ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमय़िता दमः |
१०५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
धनुर्धरो यस्य समः पृथिव्यां; न विद्यते नो भविता वा कदाचित् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
धनुर्धरो वद्धतूणो वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ध्वजं च छत्रं च क्षितौ क्षिप्रमपातय़त् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ध्वजं च छत्रं च द्विषतः स न्यकृन्तत ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
धनुर्ध्वजं च संय़त्तो रथाद्भूमावपातय़त् ||
१४ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
धनुर्भिः शक्तिभिश्चैव रथनीडैश्च माधव ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
धनुर्भिरृष्टिभिः खड्गैर्गदाभिः शक्तितोमरैः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
धनुर्भीष्मस्य चिच्छेद सव्यसाची परन्तपः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशय़ाम्यद्य यादवाः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
धनुर्मण्डलमेवास्य दृश्यते युधि भारत |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
धनुर्मण्डलमेवास्य रथमार्गेषु दृश्यते |
२० क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्महद्दितिजपिशाचसूदनं; ददौ भवः पुरुषवराय़ गाण्डिवम् ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
धनुर्मुष्टिरशीर्णश्च हस्तावापश्च माधव |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्मे नास्ति भगवन्वाहुवीर्येण संमितम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्यूपो रशना ज्या शरः स्रु; क्स्रुवः खड्गो रुधिरं यत्र चाज्यम् |
२६ क