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वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
वर्जितं व्राह्मणैर्देशमाख्यातु भगवान्मम ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
वर्जिताँल्लक्षणैर्हीनैः पृथुप्रोथान्महाहनून् |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
वर्जय़न्ति च पापानि जन्मप्रभृति ये नराः |
१०९ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
वर्जय़न्ति च राजानस्तद्राष्ट्रं पुरुषोत्तम |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
वर्जय़न्ति दिवास्वप्नं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
वर्जय़न्ति नृशंसानि पापेष्वभिरता नराः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
वर्जय़न्ति सदा सूच्यं परद्रोहं च मानवाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
वर्जय़न्ति स्म तीर्थानि पञ्च तत्र तु तापसाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
वर्जय़न्त्यशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
वर्जय़न्निशितान्वाणान्द्रोणचापविनिःसृतान् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
वर्जय़न्व्राह्मणं युद्धे शनैर्याहि यतोऽच्युतः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वर्जय़न्सर्वसैन्यानि त्वरते हि धनञ्जय़ः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वर्जय़ित्वा तु कमलं तथा कुवलय़ं विभो ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
शक्र उवाच
वर्जय़ित्वा तु मे वज्रं प्रवृणीष्व यदिच्छसि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
वर्जय़ित्वा महात्मानं व्राह्मणं परमेष्ठिनम् ||
२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
वर्जय़ित्वा रणे याहि सूतपुत्रं महारथम् |
८४ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
वर्जय़ित्वा श्मशानानि देवताय़तनानि च |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
वैशम्पाय़न उवाच
वर्जय़ेः पुत्रकान्मह्यं दहन्दावमिति स्म ह ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वर्जय़ेच्छुष्कमांसं च तथा पर्युषितं च यत् ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
वर्जय़ेत्सर्वमांसानि धर्मो ह्यत्र विधीय़ते ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
वर्जय़ेत्साधुभिर्वर्ज्यं सारमेय़ामिषं यथा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
वर्जय़ेदुपदेशं च सदैव व्राह्मणो नृप |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वर्जय़ेद्दन्तकाष्ठानि वर्जनीय़ानि नित्यशः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
वर्जय़ेद्रुषतीं वाचं हिंसां चाधर्मसंहिताम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
वर्जय़ेद्रुषितां वाचं हिंसाय़ुक्तां मनोनुगाम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वर्जय़ेद्व्यङ्गिनीं नारीं तथा कन्यां नरोत्तम |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
वर्जय़ेन्न हि तं धर्मं येषां धर्मो न विद्यते ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
वर्जय़ेन्मधु मांसं च सममेतद्युधिष्ठिर ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
वर्जय़ेल्लवणं सर्वं तथा जम्वूफलानि च |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरय़ित्वा तु मानवः |
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
वर्णतो गृह्यते चापि कामात्पिवति चाशय़ान् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
वर्णतो हेमवर्णः स सुवर्ण इति पप्रथे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
वर्णप्रवरमुख्यासि व्राह्मणी क्षत्रिय़ो ह्यहम् |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
वर्णश्च मे हरिश्रेष्ठस्तस्माद्धरिरहं स्मृतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
वर्णश्चतुर्थः पश्चात्तु पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
वर्णश्रैष्ठ्यात्कुलोत्पत्त्या श्रुतेन वय़सा धिय़ा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
वर्णसङ्करजो व्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
वर्णानां च क्षय़ं दृष्ट्वा क्षय़ान्तं च पुनः पुनः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
वर्णानां धर्महीनेषु सञ्ज्ञा नास्तीह कस्यचित् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
वर्णानां परिचर्यार्थं त्रय़ाणां पुरुषर्षभ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
वर्णानां व्राह्मणश्चासि विप्राणां दीक्षितो द्विजः |
१६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
वर्णान्पर्याय़शश्चापि प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
वर्णान्हृत्वा तु पुरुषो मृतो जाय़ति वर्हिणः |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
युधिष्ठिर उवाच
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषय़ोनिजम् |
३८ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
वर्णावकाशमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
वर्णावरोऽहं भगवञ्शूद्रो जात्यास्मि सत्तम |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
वर्णाश्चत्वार एते हि येषां व्राह्मी सरस्वती |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
वर्णाश्रमपृथक्त्वे च दृष्टार्थस्यापृथक्त्विनः |
१७७ क