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शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने तथा यज्ञे पुष्करस्थे पितामहे |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भय़ङ्करे |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भय़ानके |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भय़ावहे |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशां पते |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशां पते |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे समन्ततः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे तस्मिन्वीरवरक्षय़े |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे राजन्वीरवरक्षय़े |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे रात्रिय़ुद्धे विशां पते |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामे भरतर्षभ |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामे लोमहर्षणे |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामेऽद्भुतदर्शने |
७८ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने तदा ताभ्यां वाहुय़ुद्धे सुदारुणे |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तदा युद्धे क्षत्रिय़ाणां निमज्जने |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तदा युद्धे घोररूपे सुदारुणे |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तु सङ्ग्रामे तस्मिन्वीरवरक्षय़े |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने भय़े तस्मिन्निर्मर्यादे महाहवे |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने महाभीमे तस्मिन्वीरवरक्षय़े ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने महाराज महे रैवतकस्य च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने महारौद्रे महावीरवरक्षय़े ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने समाजे तु रमणीय़ेऽह्नि षोडशे |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने सुवहुले सत्रे द्वादशवार्षिके |
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानेऽव्रवीद्वाक्यं साम्नि ह्युच्चारिते मय़ा ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
वर्तसे मोक्षधर्मेषु गार्हस्थ्ये त्वहमाश्रमे |
६० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
वर्तसे वृत्तिमक्षीणां धर्मार्थसहितां नृषु ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
वर्तस्व पितृवत्तेषु वर्तन्ते ते हि पुत्रवत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
वर्तस्व पुरुषव्याघ्र संविजानामि तेऽनघ ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
वर्तस्व वुद्धिमूलं हि विजय़ं मनुरव्रवीत् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
वर्ताम्यहं तु यां वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
कुशिक उवाच
वर्तितं भृगुशार्दूल यन्न दग्धोऽस्मि तद्वहु ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ नित्यं धर्मानुवर्तिना |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
वर्तेथा यदि धर्मेण न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्त्मान्यन्विष्यमाणास्तु रथानां रथसत्तम |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
वर्त्स्यते सुहृदां ह्येषां युद्धेऽस्मिन्वै पराभवः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
वर्तय़ञ्शीर्णपर्णैश्च प्रकीर्णफलभोजनः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तय़न्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
वर्तय़न्ति यथान्याय़ं वैखानसमतं श्रिताः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
वर्तय़न्त्येव पितरि पुत्राः प्रभवताऽऽत्मनः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
वर्तय़ामास मुदितो देवराडिव नन्दने ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तय़ामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
व्राह्मण उवाच
वर्तय़ाम्ययुतं व्रह्म योगय़ुक्तो निरामय़ः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धता चैव गर्भेण पृथिवी तेन रञ्जिता |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
वर्धते चैव तद्घोरं द्रौणेरस्त्रं सुदुर्जय़म् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
वर्धते तदिदं पुत्र कुलं सागरवद्यथा |
४ क