द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
वर्धते तुमुलस्त्वेष शव्दः परचमूं प्रति |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
वर्धते त्वरमाणस्य विषय़ो रक्षितात्मनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
वर्धते मतिमान्राजा स्रोतोभिरिव सागरः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
जनमेजय़ उवाच
वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
वर्धनीय़ास्तव वय़ं प्रेष्याश्च मधुसूदन ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
वर्धन्ते तत्र पापानि धर्मो ह्रसति च ध्रुवम् |
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वय़ं तु स्थिरवृद्धय़ः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
वर्धन्ते वर्धमानस्य वर्धते च कथं वलम् |
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
वर्धमानं तु तं दृष्ट्वा प्रार्थय़ामास तारकः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षय़ं मनुरव्रवीत् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धमानपुरद्वारेणाभिनिष्क्रम्य ते तदा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
वर्धमानमृणं तिष्ठत्परिभूताश्च शत्रवः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षय़ं चोपगताः पुनः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
वर्धमाने च राजेन्द्र द्रोणपुत्रे महावले |
१२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धमाने हुतवहे वाते शीघ्रं प्रवाय़ति |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धमानो जय़ाशीर्भिर्निर्ययौ सैनिकैर्वृतः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
वर्धितं पालय़ेत्केन पालितं प्रणय़ेत्कथम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
वर्धितानि प्रसूत्या वै विनताकुलकर्तृभिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धेऽहं चाप्यतो भूय़ो यावन्मे मनसेप्सितम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वर्ध्यमाना जय़ाशीर्भिः सूतमागधवन्दिभिः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
वर्धय़न्तस्तथैवान्ये पूजय़न्तस्तथापरे |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
वर्धय़न्ति स्म राजानं हर्षय़ुक्ता महारथाः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
गान्धार्यु उवाच
वर्धय़न्दुर्हृदां प्रीतिं मां च शोकेन वर्धय़न् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वर्धय़न्सुमहातेजाः पुनः प्रतिनिवर्तते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
युधिष्ठिर उवाच
वर्धय़ामास तेजश्च किमर्थममितौजसाम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
वर्धय़ामास सन्त्रासं शात्रवाणाममानुषम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
वर्धय़ित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
वर्धय़िष्यामि भूय़स्त्वां विजितारिं हतद्विषम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
वर्धय़ेदशुभं कृत्वा यथा स्यादतिरेकवान् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वर्म भित्त्वा तु सौवर्णं वाणास्तस्य महात्मनः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
वर्मचापशरैश्चैव व्यवकीर्णैस्ततस्ततः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
कर्ण उवाच
वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
वर्मणां चापविद्धानां कवचानां च भूतले ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
वर्मणां तत्र राजेन्द्र व्यदृश्यन्तोज्ज्वलाः प्रभाः ||
४३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
वर्मणां सपताकानां सङ्घास्तत्रापतन्भुवि ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वर्मदेहासुमथनैर्धनुषः प्रच्युतैः शरैः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वर्मभिर्विनिकृत्तैश्च प्रासैश्छिन्नैश्च मारिष |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
वर्मभिश्चर्मभिर्हारैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वर्मभिश्चर्मभिर्हारैर्मुकुटैश्छत्रचामरैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
वर्मभिश्चामरैश्चैव व्यवकीर्णा वसुन्धरा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
वर्मभिश्चामरैश्छत्रैः पताकाभिश्च मारिष |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
वर्मभ्यां संवृतौ वीरौ भीमदुर्योधनावुभौ |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
वर्माणि च समारोप्य केचिद्भरतसत्तम ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
वर्माणि चापविद्धानि रुक्मपृष्ठानि भारत |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
वर्माण्याशु समासाद्य ते भग्नाः क्षितिमाविशन् ||
३४ ख