वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रं चान्यानि चास्त्राणि दण्डादीनि युधिष्ठिर |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
वज्रं तथा स्थापय़तां च वाय़ु; र्महाघोरं प्लवमानं जलौघैः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
वज्रं न मेने स्वकरात्प्रमुक्तं; वृत्रं हतं चापि भय़ान्न मेने ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत्कृतं तच्च ते श्रुतम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वज्रकल्पैः शरैर्भूमिं कुर्वन्नुत्तरशोणिताम् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रग्रहणचिह्नेन करेण वलसूदनः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रदत्तस्तु सङ्क्रुद्धो मुमोचाशु धनञ्जय़े |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय़ पावकः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिस्वनः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रपाणिर्महातेजा ददर्श च द्विजोत्तमम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
वज्रपाणिर्व्राह्मणः स्यात्क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युय़ोज ह ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
वज्रप्ररुग्णमचलं सिंहो वज्रहतो यथा ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
वज्रप्रहारात्कन्याश्च जज्ञिरेऽस्य महावलाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
वज्रप्रहारात्स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः |
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
वज्रप्रहारात्स्कन्दस्य सञ्जातः पुरुषोऽपरः |
१३ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रभूतेव सा राजन्नदृश्यत तदा विभो ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
वज्रमस्य क्षिपाम्यद्य स क्षिप्रं न भविष्यति |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
वज्रमुद्यम्य तान्सर्वान्पर्वतान्समशातय़म् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरन्दर ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
वज्रमृत्युप्रतीकाशैर्विचित्राय़ुधनिःसृतैः ||
२४ ग
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
वज्ररुग्णा इव वभुः पर्वता युगसङ्क्षय़े ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
वज्रसंहननप्रख्य प्रधानवलपौरुष ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
वज्रसंहननाः सर्वे सर्वे चौघवलास्तथा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वज्रसङ्घातसङ्काशस्त्रासय़न्पाण्डवान्वहून् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं यन्न यास्यति |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
वज्रस्य च करिष्यामि तव चैव शतक्रतो ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता; वृत्रस्य हन्ता नमुचेर्निहन्ता |
१५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वज्रहस्तं यथा शक्रं शूलहस्तं यथा हरम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
वज्रहस्तममन्यन्त शत्रवः शत्रुसूदनम् ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
वज्राणि चक्राणि गदा गुरुदण्डांश्च पुष्कलान् ||
३० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
वज्रादिव प्रज्वलितादिय़ं क्व नु पतिष्यति ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
वज्रादीनि च मुख्यानि नानाप्रहरणानि वै ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रादीनि तथास्त्राणि शक्रादहमवाप्तवान् ||
१४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
वज्रादुग्राद्व्येतु भय़ं तवाद्य; वातो भूत्वा हन्मि नरेन्द्र वज्रम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
वज्राद्दृढतरं मन्ये हृदय़ं मम दुर्भिदम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
वज्रान्महाधनांश्चैव वैडूर्याजिनराङ्कवान् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वज्रापविद्धैरिव चाचलेन्द्रै; र्विभिन्नपाषाणमृगद्रुमौषधैः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
वज्राशनिसमं नादममुञ्चत विशां पते ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
वज्राशनिसमस्पर्शाः शिताग्राः सम्प्रवेशिताः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वज्राशनिसमस्पर्शान्दीप्तास्यानुरगानिव ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ||
१५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
वज्राशनिसमस्पर्शैः सुपर्वभिरजिह्मगैः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
वज्राशनिसमस्पर्शैर्वध्यमानाः शरैर्गजाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
वज्राशनिसमा घोराः परकाय़ावभेदिनः |
१० क