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उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
वलं वीर्यं च तेजश्च शीघ्रता लघुहस्तता |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
वलं वीर्यं च शौर्यं च परं चाप्यस्त्रलाघवम् |
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
वलं वीर्यं तथोत्साहं हय़सङ्ग्रहणं च तत् |
३४ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
वलं वुद्धिश्च तेजश्च प्रतिपत्तिश्च भारत |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
वलं शैघ्र्यं च मोहश्च चेष्टा कर्मकृता भवः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
वलं शौर्यं मदो रोषो व्याय़ामकलहावपि |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
वलं श्रोत्रे वाङ्मनश्चक्षुषी च; ज्ञानं तथा न विशुद्धं ममाद्य |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
वलं षष्ठं षडेतानि वाचा सम्यग्यथागमम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
वलं सङ्कर्षणे नित्यं सौकुमार्यं पुनर्गदे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
वलं हि क्षत्रिय़े नित्यं वले दण्डः समाहितः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
धृतराष्ट्र उवाच
वलक्षय़ं तथा दृष्ट्वा स एकः पृथिवीपतिः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
वलक्षय़ममित्राणां सुमहान्तं करिष्यति ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
वलज्येष्ठं स्मृतं क्षत्रं मन्त्रज्येष्ठा द्विजातय़ः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
वलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः |
१८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
वलदाहविदग्धस्य पक्षिणो ध्वजवासिनः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वलदेवं च कौरव्य तथान्यान्वृष्णिपुङ्गवान् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
वलदेवं च दुर्धर्षं तथान्यान्वृष्णिपुङ्गवान् ||
२३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
वलदेवं पुरस्कृत्य सर्वप्राणभृतां वरः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
वलदेवं पुरस्कृत्य सुभद्रासहितस्तदा ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
वलदेवद्वितीय़ेन कृष्णेनामित्रघातिना |
८ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
वलदेवमुखाः सर्वे इति मे निश्चिता मतिः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
वलदेवस्य वाक्यं तु मम ज्ञाने न युज्यते |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
वलदेवादृते वीरात्पाण्डवाद्वा वृकोदरात् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
वलदेवो महावाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
वलप्रय़त्नादधिरूढवेगां; मन्त्रैश्च घोरैरभिमन्त्रय़ित्वा |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
वलमाश्रित्य मत्स्यानां पाञ्चालानां च पार्थिवः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
वलमासीत्तदा सर्वमृते द्रोणार्जुनावुभौ ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
वलमासीत्समुद्भ्रान्तं द्रोणार्जुनसमागमे ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
वलमुख्यैः सुनीता ते द्विषतां प्रतिवाधनी ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७९
तुर्वसुरु उवाच
वलरूपान्तकरणीं वुद्धिप्राणविनाशिनीम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
वललाघवसम्पन्नः सम्पन्नो विक्रमेण च |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
वलवच्चापि सङ्क्रुद्धावन्योन्यं तावगर्जताम् ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
वलवत्तां सपुत्राणां धर्मज्ञानां महात्मनाम् ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
वलवत्तां हि मन्यन्ते भीष्मद्रोणकृपादिभिः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
वलवत्पीड्यमानोऽपि रक्षसान्तर्गतेन ह ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
वलवत्प्रतिविद्धस्य नस्तः शोणितमागमत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
वलवत्संनिकर्षो हि न कदाचित्प्रशस्यते |
१६९ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वलवत्सूर्यरश्म्याभैर्भित्त्वा भित्त्वा विनेदतुः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
वलवद्दर्शने गृध्नुस्तेषां राजन्कुरु प्रिय़म् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
वलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
वलवन्तं तथात्मानं मेने वहुगुणं तदा |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
वलवन्तं महाराज क्षिप्रं दारुणमाप्नुय़ात् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
वलवन्तः कृतोत्साहा लव्धलक्षाः प्रहारिणः |
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
वलवन्तः समृद्धार्था मित्रवान्धवनन्दनाः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
वलवन्तः सुदुर्धर्षाः शूरा विक्रान्तचारिणः ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
वलवन्तश्च दाशार्हा वहवश्च विशां पते |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
वलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशय़ः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
वलवन्तो महाकाय़ा निहताश्चाप्यनेकशः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
वलवन्तो महेष्वासा विधुन्वन्तो धनूंषि च ||
९ ख