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शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
वलेन चतुरङ्गेण नानादेश्या न्यवारय़न् ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
वलेन चतुरङ्गेण निवेशमकरोत्प्रभुः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ७
भीम उवाच
वलेन तुल्यश्च न विद्यते मय़ा; निय़ुद्धशीलश्च सदैव पार्थिव |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
वलेन तुल्यो यस्य पुमान्न विद्यते; गदाभृतामग्र्य इहारिमर्दनः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वलेन तेन विक्रम्य वर्तमाने जनक्षय़े |
३० क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
वलेन तेन स ज्ञातीनभिभूय़ वृथामतिः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
वलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
वलेन नातिमहता द्वारकामभ्ययात्पुरीम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
वलेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान्प्रहासिषुः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
वलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
वलेन महता गुप्तः सामात्यः सावरोधनः ||
२५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
वलेन महता भीष्मः समसज्जत्किरीटिना ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
वलेन महता युक्तः सूतपुत्रस्तु सात्वतम् ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
वलेन महता युक्ताः स्वर्गाय़ विजय़ैषिणः |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
वलेन संविभागैश्च जय़ स्वर्गं पुनीष्व च ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वलेन सदृशं नास्ति वीर्यं तु मम रोचते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
वलेनाक्षिप्य हैडिम्वश्चकर्तास्य शिरो महत् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
वलेनाथ स संस्तभ्य व्रह्मास्त्रं समुदैरय़त् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
वलेनावजितो यश्च न तं युध्येत भूमिपः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
वलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
मनुरु उवाच
वलेर्वैरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासतः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
वलेश्च प्रथितः पुत्रो वाणो नाम महासुरः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
वलोर्मिमान्साधुरदीनसत्त्वः; समृद्धिमान्दुष्प्रसहस्त्वमेव |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
वलौघस्तु समासाद्य वलौघं सहसा रणे |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
वलौघैः सर्वतः पूर्णां वीरवृक्षापहारिणीम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संय़तेन्द्रिय़ैः |
६० क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टैः पुण्यगन्धैश्च सेवितम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
वल्गु चित्रपदं श्लक्ष्णं याज्ञसेनि त्वय़ा वचः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
वल्मीकभूतं शाम्यन्तमन्वपद्यत भामिनी ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
वल्मीकांश्चैव चैत्यांश्च तन्निविष्टमभूद्वलम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
वल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
वल्यर्थं ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं वहु ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
वल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकशः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
वल्लभस्तस्य तनय़ः साक्षाद्धर्म इवापरः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
वल्लवाय़ महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
वल्लवो भीमसेनस्तु पितुस्ते रसपाचकः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
वल्ली वेष्टय़ते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
वल्लीभिस्तृणछन्नाभिर्गूढाभिरभिसंवृतः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
वल्लीलतासङ्कटेषु कटकेषु स्थितांस्तथा ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
वलय़ः सह पुष्पैस्तु देवानामुपहारय़ेत् |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
युधिष्ठिर उवाच
वलय़श्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
वलय़श्च गृहोद्देशे अतः प्रीय़न्ति देवताः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
वलय़श्चान्नलाजाभिर्धूपनं दीपकर्म च ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ववन्दतुश्च संहृष्टौ शिरोभ्यां तौ महेश्वरम् ||
८० ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ववन्दे च यथान्याय़ं धौम्यं पुरुषसत्तमः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ववन्दे तत्तदा तेजो विवेश च नराधिप ||
२३ ख