शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांसुवर्षं पपात च |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
ववुर्वाताः सनिर्घाताः पेतुरुल्काः समन्ततः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
ववुर्वाताः सनिर्घातास्त्रासय़न्तो वरूथिनीम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ववुर्वातास्तुमुलाश्चापि राज; न्सनिर्घाता चाशानिर्गां जगाम ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
ववुश्च तुमुला वाताः शंसन्तः सुमहद्भय़म् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
ववुश्च दारुणा वाता रूक्षा गोराभिशंसिनः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
ववुश्च वाताः परुषाश्चलिता च वसुन्धरा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ववुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा; दिशश्च सर्वाः क्षुभिता वभूवुः ||
७२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ववुश्च शिशिरा वाताः सूर्यो नैव तताप च ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
ववृते पावनार्थं वै व्रह्महत्यापहो नृप ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
ववृधे च ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
ववृधे स च तत्रैव नागराजनिवेशने |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
ववृधे सा महाराज विभ्रती रूपमुत्तमम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभा ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ववृधेऽतीव राजेन्द्र चन्द्रवत्प्रिय़दर्शनः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
ववौ गन्धश्च तुमुलो दह्यतामनिशं तदा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
ववौ च मारुतः पुण्यः शुचिगन्धः सुखावहः ||
१६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
ववौ च विषमो वाय़ुः सागराश्चापि चुक्षुभुः ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ववौ च सुरभिर्वाय़ुः पुण्यगन्धो मृदुः सुखः |
५३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ववौ देवसमीपस्थः शीतलोऽतीव भारत ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ववौ शिवः सुखो वाय़ुः सर्वगन्धवहः शुचिः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
ववौ शिवः सुखो वाय़ुर्नानागन्धवहः शुचिः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ववौ संहर्षय़न्पार्थं द्विषतश्चापि शोषय़न् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ववौ समीरणश्चापि दिव्यगन्धवहः शुचिः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
वव्रे कद्रूः सुतान्नागान्सहस्रं तुल्यतेजसः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वव्रे चक्रं महावाहो स्पर्धमानो मय़ा सह ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
वव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा; दस्मिन्युद्धे वासुदेवं सहाय़म् |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
वव्रे दुर्योधनः सैन्यं मन्दात्मा यत्र दुर्मतिः |
१३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
वव्रे पिता मे परममस्त्रं नाराय़णं ततः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
वव्रे रामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजय़म् |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
वव्रे वनं महर्षिः स जैमूतं तद्वनं ततः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
वशं कोपस्य सम्प्राप्त आपवो भरतर्षभ ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
वशं चोपनय़ेच्छत्रून्निहन्याच्च पुरन्दर ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
वशं नूनं गमिष्यन्ति भीमसेनवलार्दिताः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव सुरात्मज ||
७६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
वशमेष्यति नो राज्ञः पाञ्चाला इति चुक्रुशुः ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
वशी श्वेतैर्हय़ैर्दिव्यैर्युक्तेनान्वगमन्नृपम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
वशीभूताश्च मे सर्वे भूतले च निपातिताः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
वशे कृत्वा स नृपतीनवसन्नागसाह्वय़े ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
वशे च कृत्वा राज्ञोऽन्यान्स्वराज्यमन्वशासत ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश्च महावलः ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
वशे चक्रे महावाहुः सुराष्ट्राधिपतिं तथा ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वशे चक्रे महावाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
वशे तिष्ठति सत्त्वात्मा सततं योगय़ोगिनाम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वशे तिष्ठन्ति वीरस्य यः स्थितस्तव शासने ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
वशे पापीय़सो धत्ते तत्पापमधरोत्तरम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीक्षितः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीक्षितः ||
२६ ख