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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
वसन्ते पुष्पशवलः सपुष्प इव किंशुकः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
वसन्ते पुष्पशवला निकृत्ता इव किंशुकाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
वसन्ते पुष्पशवलाश्चूताः प्रपतिता इव ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
वसन्ते पुष्पशवलो रक्ताशोक इवावभौ ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
वसन्ते पुष्पशवलौ पुष्पिताविव किंशुकौ ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्ते वाशिताहेतोर्वलवद्गजय़ोरिव ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
वसन्तेऽर्क इव श्रीमान्न शीतो न च घर्मदः ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्तो गिरिदुर्गेषु वनदुर्गेषु धन्विनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
वसन्त्याश्रित्य मुनय़ः संसिद्धा दैवतैः सह ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्दुर्योधनस्तस्यां सभाय़ां भरतर्षभ |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्द्वैतवने राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
वसन्पितृवने रौद्रे शौचं लप्सितुमिच्छसि |
९ क
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
वसन्प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
वसन्माल्यवतः पृष्ठे ददर्श विमलं नभः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
वसन्विषय़मध्येऽपि न वसत्येव वुद्धिमान् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्सागरपर्यन्तामन्वशाद्वै वसुन्धराम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
वसमानमरण्येषु नित्यं शमपराय़णम् ||
२४ ग
विराट पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा |
१ क
वन पर्व
अध्याय २४१
जनमेजय़ उवाच
वसमानेषु पार्थेषु वने तस्मिन्महात्मसु |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
वसवो मरुतः साध्या रुद्रा विश्वेऽश्विनौ तथा |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवाश्च भारत ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
वसस्व परमामित्रविषय़े प्राज्ञसंमते |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
वसस्व मय़ि कल्याणि प्रीतिर्मे त्वय़ि वर्तते |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वसां चाप्यपरे पीत्वा पर्यधावन्विकुक्षिलाः |
१३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्राय़ो विकुत्सिताः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
वसात्यं निहतं दृष्ट्वा क्रुद्धाः क्षत्रिय़पुङ्गवाः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
वसातय़ः शाल्वकाः केकय़ाश्च; तथाम्वष्ठा ये त्रिगर्ताश्च मुख्याः ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
वसातय़ः समौलेय़ाः सह क्षुद्रकमालवैः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
वसातय़ो महाराज द्विसाहस्राः प्रहारिणः |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
वसानं चर्म वैय़ाघ्रं महारुधिरविस्रवम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
वसानस्तत्र वै पुर्यामदितेर्विप्रिय़ङ्करम् |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
वसामः सुसुखं पुत्र व्राह्मणस्य निवेशने |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि धर्मशीलेषु धर्मज्ञेषु महात्मसु |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि नारीषु पतिव्रतासु; कल्याणशीलासु विभूषितासु ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि नित्यं सुवहूदकासु; सिंहैर्गजैश्चाकुलितोदकासु |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि फुल्लासु च पद्मिनीषु; नक्षत्रवीथीषु च शारदीषु ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि सत्यशीलासु स्वभावनिरतासु च ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
वसामि सत्ये सुभगे प्रगल्भे; दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
वसामेदोवहाः कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
वसामेदोसृगादिग्धां जिह्वां वैवस्वतीमिव ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
वसामेदोस्थिनिर्यासैर्न कार्यः पुष्टिमिच्छता ||
५१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वसामेह परां रात्रिं वलवान्मे परिश्रमः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
वसारुधिरसम्पृक्ताः सन्ध्याय़ामिव तोय़दाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
वसावेह क्षपामेतां रुचितं यदि तेऽनघ ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठ इति यस्यैतदृषेर्नाम त्वय़ेरितम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि वै ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
वसिष्ठ इव विप्राणां तेजसामिव भास्करः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठं चालय़ामास तपसोग्रेण तच्छृणु ||
८ ख