आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठं प्रति दुर्धर्षं तथामित्रसहं नृपम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
वसिष्ठं मनसा गत्वा श्रुत्वा तत्रास्य गोचरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
वसिष्ठं श्रेष्ठमासीनमृषीणां भास्करद्युतिम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
वसिष्ठः कश्यपश्चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते नृप ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिश्च व्रह्मलोकं निनीषवः ||
८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
वसिष्ठः काश्यपश्चैव विश्वामित्रोऽत्रिरेव च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
वसिष्ठः परमेष्ठी च विवस्वान्सोम एव च |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठः परमेष्वासं सत्यसन्धो द्विजोत्तमः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाव्रताः ||
३७ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
वसिष्ठमग्र्यं तपसो निधानं; यश्चापि सूर्यं व्यतिरिच्य भाति ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
वसिष्ठमीशं विप्राणां वसूनां जातवेदसम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
वसिष्ठवामदेवाभ्यां विप्रैश्चान्यैः सहस्रशः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठशिष्यं तं तात मनसास्मि गतो नृप ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
वसिष्ठश्च महातेजा एते चित्रशिखण्डिनः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षय़ः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वाय़म्भुवस्तथा |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
वसिष्ठश्च महाभागः सदृशा वै स्वय़म्भुवा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठश्च महाभागः सर्वमेतदपश्यत |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
वसिष्ठस्त्वमृषीणां च ग्रहाणां सूर्य उच्यसे ||
१५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठस्य च शापेन निय़ोगाद्वासवस्य च ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
वसिष्ठस्य च संवादं करालजनकस्य च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
वसिष्ठस्य च संवादं व्रह्मणश्च युधिष्ठिर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
वसिष्ठस्य सुतः शक्तिः शक्तेः पुत्रः पराशरः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
जनमेजय़ उवाच
वसिष्ठस्यापवाहो वै भीमवेगः कथं नु सः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
वसिष्ठस्याश्रमे विप्रा भक्षितास्तैर्दुरात्मभिः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद्रक्षः सन्दिदेश ह ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ रुद्रं च प्रभुमीश्वरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
वसिष्ठादृषिशार्दूलान्नारदोऽवाप्तवानिदम् ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं; धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठेन सहाय़ान्तीं संहृष्टोऽभ्यधिकं वभौ ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञातस्तस्मिन्नेव धराधरे |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठो घातिताञ्श्रुत्वा विश्वामित्रेण तान्सुतान् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
वसिष्ठो जमदग्निश्च विश्वामित्रोऽत्रिरेव च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
वसिष्ठो जीवय़ामास प्रजापतिरिव प्रजाः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठो नाम भगवांश्चाक्षुषस्य मनोः सुतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठो नाम स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठो वामदेवश्च भूरिद्युम्नो गय़ः क्रथः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठो वारय़ामास हेतुना येन तच्छृणु ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठोऽथ विसृष्टश्च पुनरेवाजगाम ह |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
वसिष्ठ उवाच
वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासं गृहेष्वपि |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदय़त् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
वसु चैव शरीरं च यदुदारं तथा यशः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
वसु तस्य गृहे यच्च प्राणानपि च केवलान् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वसु तेभ्य उपादाय़ लौहित्यमगमद्वली ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वसु प्रदाय़ च ततः प्रदक्षिणमवर्तत ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वसु विश्राण्य तत्सर्वं पुनराय़ान्महीपतिः ||
१५ ख