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शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
वज्रास्थिकाय़ाः सममानोन्माना; दिव्यान्वय़रूपाः शुभसारोपेताः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रवाधनात् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
वज्रिणं मृगय़ामास तदा भरतसत्तम ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
वज्रिणा निहतो वृत्रः संय़ुगे भूरितेजसा |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वज्रिवज्रप्रमथिता यथैवाद्रिचय़ास्तथा ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
वज्रिवज्राहतानीव शिखराणि महीभृताम् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
शक्र उवाच
वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
वज्रेण विष्णुय़ुक्तेन दिवमेव समाविशत् ||
९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रेणाक्रूरदारास्तु वार्यमाणाः प्रवव्रजुः ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
वज्रेणेव यथा शृङ्गं पर्वतस्य महाधनम् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
वज्रैः पिनाकैरशनिप्रहारै; श्चक्रैः शतघ्न्युन्मथिताश्च पेतुः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
वज्रैरिव महावेगैः शिखराणि धराभृताम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
वज्रैश्च विविधाकारैः शक्तिभिः परिघैरपि |
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
वज्रो नामैष तु व्यूहो दुर्भिदः सर्वतोमुखः |
३४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रो राजा त्वय़ा रक्ष्यो मा चाधर्मे मनः कृथाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं प्रत्यवैक्षत ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
वज्रोऽय़ं भवतां राजा शक्रप्रस्थे भविष्यति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
वञ्चनाय़ां च लोकस्य स सुखेनेह जीवति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
वञ्चनाय़ां च लोकस्य स सुखेष्वेव जीर्यते ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
वञ्चितोऽस्मीति मन्वानो मां किलोद्धर्तुमिच्छति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
वञ्चितोऽस्म्यनय़ा यद्धि निर्विकारो विकारय़ा ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
वञ्चितोऽय़ं नृशंसात्मा कालं मन्ये पलाय़ने ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
वञ्चय़द्भिर्निवस्तव्यं छन्नवासं क्वचित्क्वचित् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
वञ्चय़न्ति नरा ये च ते वै निरय़गामिनः ||
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
वञ्चय़न्तौ पुनश्चैव चेरतुः कुरुसत्तमौ ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
वञ्चय़ित्वा गतस्त्वां वै तेनासि हरिणः कृशः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
वञ्चय़ित्वा तथा भीमं गदय़ा कुरुसत्तमः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
वञ्चय़ित्वा महावुद्धिं मृगरूपेण राघवम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
वटवरुणकवत्सनाभविल्वैः; सरलकपित्थप्रिय़ालसालतालैः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
वटस्ताण्ड्यः कृपश्चैव कक्षीवान्कमठादय़ः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
वटाकरमय़ं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
वटुमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
वटेश्वरपुरं गत्वा अर्चय़ित्वा तु केशवम् |
१११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
वडगृध्रसृगालानां घोरसङ्घैर्निषेविताम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
वडवानां च शुभ्राणां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् |
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
वडवामुखः पिवत्यम्भो योऽसौ परमदारुणः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
वडवामुखदीप्ताग्नेस्तोय़हव्यप्रदं शुभम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
वडवामुखमध्यस्थो मुच्येतापि हि मानवः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १३३
राजो उवाच
वडवे इव संय़ुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
वडाः कङ्का वृका भूमावपिवन्रुधिरं मुदा ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वडानां वाय़सानां च पुरस्तात्सव्यसाचिनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
वडिशोऽय़ं त्वय़ा ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्वितः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
वणिक्पथं द्विजक्षत्रं वैश्यशूद्रं तथैव च |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
वणिग्भिश्चावकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
वणिग्यथा समुद्राद्वै यथार्थं लभते धनम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
वणिजः कर्षका गोपाः कारवः शिल्पिनस्तथा |
३१ क