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आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
वसूनां भार्गवं विद्याद्विश्वेदेवांस्तथैव च ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा |
१२० क
वन पर्व
अध्याय २९८
युधिष्ठिर उवाच
वसूनां वा भवानेको रुद्राणामथ वा भवान् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
वसूनां समय़ं स्मृत्वा अभ्यगच्छदनिन्दिता ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
वसूनि पुत्रांश्च वसुन्धरां तथा; कुरूंश्च शोचध्वमिमां च वाहिनीम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
वसूनि विविधान्भोगान्राज्यमेव च केवलम् |
१६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वसूनेव महातेजा भीष्मः प्राप महाद्युतिः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
वसेद्युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहनः ||
६७ ग
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
वसेम इत्याह पुरा स राजा; मध्ये कुरूणां स मय़ोक्तस्तथेति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
वसेम सहिता येषु मा च नो भरता नशन् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो; न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
वसेह द्रौपदीं रक्षन्यावदागमनं मम ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
वसेय़ं यत्र चाङ्गेऽहं तन्मे व्याख्यातुमर्हथ ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
वसोः पत्नी तु गिरिका कामात्काले न्यवेदय़त् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
वसोर्धारानुपीतत्वात्तेजसाप्याय़ितेन च |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
वस्तिमूले गुदे चैव पावकः समुपाश्रितः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
वस्तुं त्वय़ीच्छामि विशां वरिष्ठ; तान्राजसिंहान्न हि वेद्मि पार्थान् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जय़ं जय़तां वरम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वय़ा सह ममानघ ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
वस्त्रं च विविधाकारमभवत्समुपार्जितम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्रप्रदानेन फलं सुरूपं; गन्धप्रदाने सुरभिर्नरः स्यात् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्रमापस्तिलान्भूमिं गन्धो वासय़ते यथा |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्रमाल्योत्करय़ुतो वीणावेणुमृदङ्गवान् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
वस्त्रमुत्कर्षति मय़ि प्राहसत्स वृकोदरः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
वस्त्ररश्मिधरं सद्यः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकाः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वस्त्राणि च प्रसूय़न्ते फलेष्वाभरणानि च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
वस्त्राणि चान्यानि वहून्यभिमन्यत्यवुद्धिमान् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथासन्नान्यनेकशः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २२३
द्रौपद्यु उवाच
वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः; स्वर्गश्च लोको विषमा च कीर्तिः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्राण्युपादाय़ महारथानां; तूर्णं पुनः स्वं रथमारुरोह ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
वस्त्राभरणदातारो भक्षपानान्नदास्तथा |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
वस्त्राभरणशस्त्राणि ध्वजवर्माय़ुधानि च ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
वस्त्रार्धकर्तसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् ||
१८ ग
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
वस्त्रै रत्नैरलङ्कारैः पूजय़न्तो द्विजन्मनः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
वस्त्रैश्छत्रैश्च विध्वस्तैश्चामरव्यजनैरपि |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
वस्वोकसारा नलिनी पावना च सरस्वती |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
वहतः प्रथमं कल्पमनुकल्पेन जीवनम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
वहतश्च यथाशक्ति यो न तुष्यति मन्दधीः |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
वहतां शार्ङ्गधन्वानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
वहतां सुमहाभारं संनिकर्षे स्वनं प्रभो |
११ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
वहते तन्निय़ोगाद्वै वय़मभ्युत्थितास्त्रय़ः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
वहतो विविधा दीक्षाः सम्प्रहृष्यत भारत ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
वहन्तं कुरुशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् ||
४ ख