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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
वहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणवृत्तय़ः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
वहिर्गिर्याङ्गमलदा मागधा मानवर्जकाः ||
४८ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
वहिर्वत्स्यामहे सर्वे सज्जीभवत माचिरम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
वहिर्विवासिताः सर्वे रक्षद्भिर्वित्तसञ्चय़ान् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
वहिश्च नाम ह्लीकश्च विपाशाय़ां पिशाचकौ |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
वहिश्चरानुपन्यासान्कृत्वा वेश्मानुसारिणः ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
वहिष्कृता हिमवता गङ्गय़ा च तिरस्कृताः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
वहु कथितमिदं हि वुद्धिमद्भिः; कविभिरभिप्रथय़द्भिरात्मकीर्तिम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
वहु कल्याणमिच्छन्त ईहन्ते पितरः सुतान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
वहु कल्याणमिच्छन्त ईहन्ते पितरः सुतान् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
वहु चाप्यनुय़ुक्तोऽस्मि तन्मानुज्ञातुमर्हसि ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण्यु उवाच
वहु चाल्पं च सङ्क्षिप्तं विप्लुतं च मतं मम ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
वहु नानाविधं चक्रुर्मद्यं मांसमनेकशः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
वहु मन्ये च ते वुद्धिं भृशं सम्पूजय़ामि च |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वहु मेनेऽर्जुनोऽऽत्मानमिदं चाह जनार्दनम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
वहु यत्नेन महता दोषनिर्हरणं तथा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
वहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
शकुनिरु उवाच
वहु वित्तं पराजैषीः पाण्डवानां युधिष्ठिर |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
शकुनिरु उवाच
वहु वित्तं पराजैषीर्भ्रातॄंश्च सहय़द्विपान् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय ५६
विदुर उवाच
वहु वित्तं पाण्डवांश्चेज्जय़ेस्त्वं; किं तेन स्याद्वसु विन्देह पार्थान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
वहु सङ्कसुकं दृष्ट्वा विवित्सासाधनेन च |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
वहु सञ्चिन्त्य इह वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ||
२८ ग
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
वहुकक्ष्यान्वितान्राजन्दीर्घिकावृक्षशोभितान् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
वहुकल्याणसंय़ुक्तं भाषसे विहगोत्तम |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
वहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
वहुकारं च सस्यानां वाह्ये वाह्यं तथा गवाम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
वहुगुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
वहुतालसमुत्सेधाः शैलशृङ्गात्परिच्युताः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
वहुतालोच्छ्रय़ं शृङ्गमारुरोह महावलः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८
सूत उवाच
वहुत्वं प्रेक्ष्य सर्पाणां प्रजानां हितकाम्यया ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
वहुत्वाच्चावजानन्तः सर्वाँल्लोकान्सहामरान् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
वहुत्वात्काञ्चनस्यास्य ख्यातो वहुसुवर्णकः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
वहुत्वात्तु परामार्तिं शराणां तावगच्छताम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
वहुत्वात्सागरप्रख्यं देवानामिव संय़ुगे ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
वहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडय़ेत् ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
वहुत्वान्नामधेय़ानामितरे न प्रकीर्तिताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
वहुत्वान्नामधेय़ानि भुजगानां तपोधन |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
वहुत्वान्निहतौ तत्र उभौ कृष्णस्य पश्यतः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वहुत्वान्मम कार्याणां तथा पार्थस्य पार्थिव |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
वहुदंशकुशान्देशान्नय़न्ति वहुकर्दमान् ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
वहुदुःखसुखं देहं नोत्सृजेय़महं विभो ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
वहुदुर्गा महावृक्षा वेत्रवेणुभिरास्तृता |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
वहुदेवासुरालोका वहुगन्धर्वदर्शना |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
युधिष्ठिर उवाच
वहुदेय़ाश्च राजानः किं स्विद्देय़मनुत्तमम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
वहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिय़ा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
वहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिय़ा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
वहुधा चिन्तय़ामास द्रोणस्य प्रतिवारणम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
वहुधा चैकधा चैव कृत्वात्मानं महात्मना |
८० क
विराट पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
वहुधा तस्य सैन्यस्य व्यूढस्यापततः शरैः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
वहुधा दारितश्चैव विषाणैस्तत्र दन्तिभिः |
३४ क