शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
वाङ्मनोनिय़मः साम्यं मानसं तप उच्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
वाङ्मनोभ्यां शरीरेण शुचिः स्यादनहङ्कृतः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
वाङ्मनोवुद्धिरित्येभिः सार्धमष्टात्मकं जगत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
वाङ्मात्रेण विनीतः स्याद्धृदय़ेन यथा क्षुरः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
वाङ्मैथुनमथो जन्म मरणं च समं नृणाम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
वाचं कथञ्चित्स्थिरतामुपेत्य; तत्सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
वाचं चोच्चारय़िष्यध्वमुच्चैरव्यञ्जिताक्षरम् |
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
वाचं तां वचनार्हस्य शिक्षाक्षरसमन्विताम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
वाचं तेन न सन्दध्याच्छुचिः सङ्क्लिष्टकर्मणा ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वाचं न ममृषे धीमानुत्तमाश्वः कशामिव ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
वाचं न सृजते काञ्चिद्धीनप्रज्ञोऽल्पचेतनः ||
११ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
वाचं स वदतां श्रेष्ठो ह्लादिनीं वचनक्षमाम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
वाचं सत्यां पुरुहूतस्य कर्तुं; वृहस्पतेश्चापचितिं चिकीर्षुः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
वाचः काव्याः सुहृदां पथ्यरूपा; न श्रूय़न्ते वर्धते लोभ एव ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
वाचः पुण्याः कीर्तिमतां मनोहृदय़हर्षिणीः ||
१०२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
वाचः प्रदक्षिणाश्चैव योधानामभिगर्जताम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
वाचः शुश्राव ताः क्रुद्धो राक्षसः पुरुषादकः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
वाचः शेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
वाचमुच्चारितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
वाचमुच्चारय़न्दिव्यां धर्मस्य वचनात्किल ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
वाचश्च पतय़े नित्यं सरितां पतय़े तथा ||
९४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
वाचश्च परुषाः प्राप्तास्त्वय़ा ह्यस्मद्धितैषिणा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वाचश्च वक्तुं संसत्सु मम पुत्रमरक्षताम् ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
वाचश्चाप्यशरीरिण्यस्तत्पराभवलक्षणम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
वाचश्चाप्यशरीरिण्यो दिवश्चोल्काः प्रपेदिरे |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
वाचस्ताः सुहृदः श्रुत्वा सञ्ज्वरिष्यन्ति मे भृशम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
अर्जुन उवाच
वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्यः सूतपुत्रेण भाषिताः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
वाचस्पतिं चन्द्रमसमपः पृथ्वीं सरस्वतीम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
वाचा क्षिपति संरव्धस्ततः पश्चात्प्रसीदति ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
वाचा च मनसा चैव कथं दुःखात्प्रमुच्यते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रय़ुज्य सा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
वाचा च मनसा चैव यथा नाभिचराम्यहम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
वाचा तु यत्कर्म करोति किं चि; द्वाचैव सर्वं समुपाश्नुते तत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
वाचा दुरुक्तं देवर्षे तन्मे दहति नित्यदा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
वाचा दुरुक्तं वीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
वाचा दुरुक्तं वीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ||
७५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात्सङ्घर्षेणेति पञ्चधा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
वाचा भीष्मश्च शाल्वश्च मम राज्ञि वशानुगौ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वाचा मधुरय़ा प्राह सान्त्वय़न्निव भारत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वाचा युद्धे प्रवृत्ते नो वाचैव प्रतिय़ोधनम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
वाचा वा वधवन्धैर्वा क्लेशैर्वा विविधैस्तथा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
वाचा सुनिय़तो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
वाचाथ वध्यते येन मुच्यतेऽप्यथ वा पुनः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
वाचापि पुरुषानन्यान्सुव्रता नान्वकीर्तय़त् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
वाचापि भर्तुः परमाणुमात्रं; नेच्छामि दोषं स्वगुणान्विसृज्य ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
वाचि दण्डो व्राह्मणानां क्षत्रिय़ाणां भुजार्पणम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
वाचिष्ठ उग्रः सेनानीः सत्यो वाजसनिर्गुहः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
वाचो यत्राभवन्मेघा उपलाश्च सहस्रशः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं; विवित्सावेगमुदरोपस्थवेगम् |
१५ क