आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं चक्षुश्च जिह्वा च त्वक्ष्रोत्रं चैव पञ्चमम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो वुद्धिरेव च |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्च श्रोत्रं च पञ्चमम् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्च श्रोत्रं च पञ्चमम् |
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्ष्रोत्रं मन एव च |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्ष्रोत्रं वुद्धिरेव च |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वङ्मनो वुद्धिरेव च |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च श्रोत्रं वुद्धिर्मनस्तथा |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो वुद्धिरेव च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
घ्राणमध्यात्ममित्याहुर्यथाश्रुतिनिदर्शनम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
घ्राणस्थश्च तथा वाय़ुर्गन्धज्ञाने विधीय़ते ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
घ्राणेन गन्धं जिह्वय़ाथो रसं च; त्वचा स्पर्शं मनसा वेद भावम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यां सूर्यमेव च |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
घ्राणेन न तदाघ्रेय़ं न तदाद्यं च जिह्वय़ा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
घ्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
घ्राता भक्षय़िता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
घ्राता भक्षय़िता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
घ्रेय़ं घ्राणं शरीरं च ते तु भूमिगुणास्त्रय़ः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
घ्रेय़ं घ्राणं शरीरं च भूमेरेते गुणास्त्रय़ः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
घ्रेय़ं पेय़ं च दृश्यं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
घ्रेय़ाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
घ्रेय़ाण्यपि च सर्वाणि जह्याद्ध्यानेन योगवित् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
घ्रेय़े पेय़े च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च |
२२ क