chevron_left  वाताय़मानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्तुरङ्गमैःarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्तुरङ्गमैः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैस्तैरश्वैरपनीतो रणाजिरात् ||
१०६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैस्तैरश्वैरपानीय़त सङ्गरात् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैस्तैरश्वैर्हृतो वृष्णिशरार्दितैः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
वातिकांश्चाव्रवीद्राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रमः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वातिकानां सकाशात्तु श्रुत्वा दुर्योधनं हतम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
वातिकाश्च नरा येऽत्र दृष्ट्वा ते हर्षमागताः ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वाते च पूतिगन्धे च मनसापि न चिन्तय़ेत् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
वातेन कुन्त्यां वलवान्स जातः; शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
वातेनेव समुद्धूतमभ्रजालं विदीर्यते |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
वातो मेघानिवाविध्यन्प्रवाञ्शरवनानिलः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहु; र्दावैर्जीमूतैः सदृशं रूपमस्य ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतं रजस्तीव्रं कौशेय़निकरोपमम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतपताकान्तं रथं जलदनिस्वनम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतपताकाभ्यां युय़ुधाते महावलौ ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतपताकेन स्यन्दनेनौघनादिना ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतार्णवाकारः प्रवृत्त इव लक्ष्यते ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतौ क्षुव्धसत्त्वौ भैरवौ सागराविव ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवेजितः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धस्तपःस्वाध्याय़शीलवान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
वादं तु यो न प्रवदेन्न वादय़े; द्यो नाहतः प्रतिहन्यान्न घातय़ेत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्रं च यथान्याय़ं प्रत्यविन्दद्यथाविधि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
वादित्रं नृत्तगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
वादित्रघोषस्तनितां चापविद्युद्ध्वजैर्वृताम् ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
वादित्रघोषस्तुमुलो विमिश्रः शङ्खनिस्वनैः |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
वादित्रनादितानां च सोऽद्य न श्रूय़ते महान् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
वादित्रनिनदश्चोग्रः सुमहाँल्लोमहर्षणः ||
३२ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्ररथघोषौघां वेश्मतीर्थमहाग्रहाम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वादित्रशव्दस्तुमुलः शङ्खभेरीविमिश्रितः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
वादित्रशव्दैर्विविधैः सिंहनादैश्च नर्तितैः |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणां च घोषेण शङ्खानां निस्वनेन च |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणां च निनदः प्रादुरासीद्विशां पते |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणां च निनदैः कम्पय़न्निव मेदिनीम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्राणि च तत्र स्म वादकाः समवादय़न् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि जगुश्चाप्सरसां गणाः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि वादय़ामासुरञ्जसा ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि सुघोषाणि समन्ततः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणि च सञ्जघ्नुः सौभद्रं चापि तुष्टुवुः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलङ्कृताः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
वादित्राणि च सर्वाणि गीतं च मधुरस्वरम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
वादित्राणि च सर्वाणि नानालिङ्गानि सर्वशः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
वादित्राण्यभ्यवाद्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
वादित्रैर्विविधैर्गीतैर्गन्धैरुच्चावचैरपि |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
वादुलिर्मुसलश्चैव रक्षोग्रीवस्तथैव च ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
वाद्यं हृत्वा तु पुरुषो मशकः सम्प्रजाय़ते |
९४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
वाद्यमानान्यरोचन्त मेघशव्दा यथा दिवि ||
२२ ख