शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वारुण्योऽथ च माहेन्द्र्यस्तथाग्नेय़्यः परन्तप ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वार्ताधर्मे ह्यवर्तन्त्यो विनश्येय़ुरिमाः प्रजाः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
वार्तामूलो ह्ययं लोकस्त्रय़्या वै धार्यते सदा |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
वार्त्ताय़ां संश्रितस्तात लोकोऽय़ं सुखमेधते ||
६९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
वार्त्तिकानां कथय़तां स मे मर्माणि कृन्तति ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
वार्त्तिकैः कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभवः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वार्तय़ा धार्यते सर्वं धर्मैरेतैर्द्विजातिभिः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
वार्द्धकेन च राजेन्द्र तपसा चैव कर्शिता ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वार्द्धक्षत्रिः सर्वसैन्यस्य मध्ये; भूरिश्रवाः पुरुमित्रो जय़श्च |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
वार्धक्षत्रिरुपासेधत्प्रवणादिव कुञ्जरान् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वार्धक्षेमिं चित्रसेनं सेनाविन्दुं सुवर्चसम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
वार्धक्षेमिं तु वार्ष्णेय़ं कृपः शारद्वतः शरैः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वार्धक्षेमिः कलिङ्गानां यः कन्यामाहरद्युधि |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वार्धक्षेमिः सुवर्चाश्च सेनाविन्दुश्च पार्थिवः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वार्धक्षेमिर्महाराज कृत्वा कदनमाहवे |
७९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
वार्धक्षेमिर्महाराज रथो मम महान्मतः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
वार्यतां साध्वय़ं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
वार्यतां साध्वय़ं राजंस्त्वय़ा धर्मभृतां वर ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणं हि भीष्मेण द्रोणेन च विशां पते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणः स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणश्च विशिखैः सहदेवो रणं जहौ ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
वार्यमाणस्तय़ा देव्या विस्फुरन्त्या यथावलम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणा महासेना पुत्रैस्तव जनेश्वर |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१७
दुर्योधन उवाच
वार्यमाणा मय़ा पूर्वं नैते चक्रुर्वचो मम |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणा यय़ुर्वेगात्तव पुत्रेण भारत ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणाः प्रविष्टाश्च भीमसेनस्य पश्यतः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणाः शकुनिना स्वैश्च योधैर्महावलैः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणाः स्म वहुशस्त्रैगर्तेन सुशर्मणा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणापि कौन्तेय़ पृतना नावतिष्ठते ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
वार्यमाणास्तु पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
वार्यमाणाहृतं चान्नं शुक्तं पर्युषितं च यत् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणेन निहतस्ततः पापतरं नु किम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
धृतराष्ट्र उवाच
वार्यमाणो मय़ा तात भीष्मेण विदुरेण च ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
वार्यमाणोऽकरोद्वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरैः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणोऽपि कौन्तेय़ यद्युद्धान्न निवर्तसे ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
वार्यमाणोऽपि पापेभ्यः पापात्मा पापमिच्छति |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणोऽपि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणौ ततस्तौ तु शैनेय़शरवृष्टिभिः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगवलात्कृतः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महावलः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
वार्षिकं सञ्चय़ं केचित्केचिद्द्वादशवार्षिकम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
वार्षिकांश्चतुरो मासान्पुरा मय़ि सुखोषितः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
वार्षिकी ग्राहवहुला दुस्तीर्था कुटिला तथा ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
वार्ष्णेय़ मधुहन्वीर शिरसा त्वां प्रसादय़े |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वार्ष्णेय़ं च शरैस्तीक्ष्णैः कम्पय़ामास रोषितः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
वार्ष्णेय़ं तु ततो भैमी सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा गिरा |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
वार्ष्णेय़ं प्रथमं राजन्प्रत्याख्याय़ महावलम् ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
वार्ष्णेय़ं मन्यते कृष्णमर्हणीय़तमं भुवि ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
वार्ष्णेय़ं समरे क्रुद्धो नाराचेन समर्दय़त् ||
४६ ख