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आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
अदूरादभ्युपेत्यैनं देवाः सर्षिगणास्तदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
अदूरादाश्रमं कञ्चिद्वासार्थमगमं ततः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
अदूरे कन्यकुव्जस्य गङ्गाय़ास्तीरमुत्तमम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अदृढात्मा दृढक्रोधो नास्यार्थो रमतेऽन्तिके ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्य आसीत्कुपिते धनञ्जय़े; तुषारनीहारवृतं यथा नभः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं च मुहूर्तेन चक्रुस्ते भरतर्षभ |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं चक्रतुर्युद्धे तदद्भुतमिवाभवत् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं दृश्य राजानं भारद्वाजस्य साय़कैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं समरे चक्रुः साय़कौघैः समन्ततः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं समरे चक्रे जीमूत इव भास्करम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं समरेऽन्योन्यं चक्रतुस्तौ महारथौ ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यं साय़कैश्चक्रुर्मेघा इव दिवाकरम् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यंस्तत्र गात्राणि शरैश्छिन्नानि भागशः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यंस्तत्र गिर्याभाः सहस्रशतय़ोधिनः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
अदृश्यः सर्वभूतानां कालाकाङ्क्षी चचार ह ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
अदृश्यत ततः साक्षाद्भगवान्गोवृषध्वजः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत तदा तत्र पुनरुन्मज्जितोऽन्यतः ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यत तदा राजंश्चन्द्रोदय़ इवार्णवः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत निमेषार्धाद्घोररूपं समाश्रितः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
अदृश्यत महाकूपस्तृणवीरुत्समावृतः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत महाराज वाणभूतमिवाभवत् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत मही कीर्णा वातनुन्नैर्द्रुमैरिव ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत मही तत्र दारुणप्रतिदर्शना ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत महेष्वासः सवज्र इव वज्रभृत् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यत रिपून्निघ्नञ्शिक्षय़ास्त्रवलेन च ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यत शिरश्छिन्नं रजोध्वस्तं सकुण्डलम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यद्वै लाघवात्सूतपुत्रः; सर्वं वाणैश्छादय़ानोऽन्तरिक्षम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त तथान्ये च निघ्नन्तस्तव वाहिनीम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त भुजाश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त भुजाश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज गङ्गेव यमुनान्तरे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज तस्मिन्परमसङ्कुले ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज तस्मिन्परमसङ्कुले ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुनः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज नक्षत्राणि यथा दिवि ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युताः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त यथा राजन्मेघसङ्घाः सविद्युतः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यन्त वने तस्मिन्प्राणिनः प्राणसङ्क्षय़े ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाहं सैनिकाश्च मे ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अदृश्यन्त सप्तर्षय़ो मनुर्मत्स्यः सहैव ह ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्त ससूताश्च साश्वाः सरथय़ोधिनः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्ताचलाग्रेषु द्रुमा भग्नशिखा इव ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्तान्तरिक्षस्थाः शतशोऽथ सहस्रशः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अदृश्यन्तार्यवर्णेषु शूद्राश्चापि तपोधनाः ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यन्तोद्यतान्येव सर्वप्रहरणानि च |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यन्तोष्णपर्याय़े मेघानामिव वागुराः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
गन्धर्व उवाच
अदृश्यन्त्यश्रुपूर्णाक्षी शृण्वन्ती तमुवाच ह ||
६ ख