आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रीणि श्लोकसहस्राणि द्वे शते विंशतिस्तथा |
१७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीय़ते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
त्रीणि स्थानानि चैतानि जानीय़ात्प्राकृतानि ह ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
त्रीणि स्रोतांसि यान्यस्मिन्नाप्याय़न्ते पुनः पुनः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
त्रीण्यर्पितान्यत्र शतानि मध्ये; षष्टिश्च नित्यं चरति ध्रुवेऽस्मिन् |
१५० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
त्रीण्युग्रवीर्याणि समागतानि; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
त्रीण्येव तु पदान्याहुः पुरुषस्योत्तमं व्रतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
त्रीण्येव तु पदान्याहुः सतां वृत्तमनुत्तमम् |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीण्येवैतानि दिव्यानि धनूंषि दिविचारिणाम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
त्रीनग्नीनिव कौरव्याञ्जनय़ामास वीर्यवान् ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य वहुदक्षिणान् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीनिवात्मसमान्वन्धून्वन्धुमानिव मानय़न् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीनुपाय़ानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः |
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
त्रीनेतांस्त्रिभिरानर्छद्विषाग्निप्रतिमैः शरैः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्रीन्कृशान्नावजानीय़ाद्दीर्घमाय़ुर्जिजीविषुः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
त्रीन्दोषान्सर्वभूतेषु निधाय़ पुरुषः सदा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
त्रीन्धारय़ति लोकान्वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नारद उवाच
त्रीन्पिण्डान्न्यस्य वै पृथ्व्यां पूर्वं दत्त्वा कुशानिति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
त्रीन्मासानाविकेनाहुश्चातुर्मास्यं शशेन तु ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
त्रीन्वर्णाननुतिष्ठन्ति यथावदनसूय़काः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
त्रीन्स पुत्रानजनय़त्तदा भरतसत्तम ||
३५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
त्रुटिशो लवशश्चात्र गण्यते कालनिश्चय़ः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
त्रेताग्निमन्त्रपूतं वा समाविश्य द्विजो भवेत् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
त्रेताग्निमन्त्रविहितो वैश्यो भवति वै यदि |
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
त्रेतादौ सकला वेदा यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
त्रेताद्वापरय़ोः सन्धौ पुरा दैवविधिक्रमात् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रेताद्वापरय़ोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
त्रेतानिर्मोक्षसमय़े द्वापरप्रतिपादने ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
त्रेतापूतं धूममाघ्राय़ पुण्यं; प्रेत्य स्वर्गे देवसुखानि भुङ्क्ते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
त्रेताप्रभृति वर्तन्ते ते जना भरतर्षभ ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
त्रेतामपि निवोध त्वं यस्मिन्सत्रं प्रवर्तते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
त्रेताय़ां तु समस्तास्ते प्रादुरासन्महावलाः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
त्रेताय़ां द्वापरे चैव कलिजाश्च ससंशय़ाः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रेताय़ां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
त्रेताय़ां भावसङ्कल्पाः क्रिय़ादानफलोदय़ाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
त्रेताय़ां संहता ह्येते यज्ञा वर्णास्तथैव च |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
त्रेताय़ाः करणाद्राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
त्रेताय़ाः कारणाद्राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रेताय़ुगादौ च पुनर्विवस्वान्मनवे ददौ |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्रेताय़ुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्वहः |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
त्रेताय़ुगे विधिस्त्वेषां यज्ञानां न कृते युगे |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
त्रेसुस्तथापरे घोरे वने दावाग्निसंवृताः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैकालिकमिदं ज्ञानं प्रादुर्भूतं यथेप्सितम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैकाल्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दातुं यय़ौ हरिः ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
त्रैखर्वं वलिमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
त्रैगुण्यविषय़ा वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैपुरं स वशे कृत्वा राजानममितौजसम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
त्रैलोक्यं तपसा व्याप्तमन्तर्भूतेन भास्वता |
१५ क