उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वालां मामार्यकस्तुभ्यं क्रीडन्तीं कन्दुहस्तकाम् |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
वालां वन्धुमतीं यन्मामधर्मेणोपगच्छथ |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
वालाः पित्रा विहीनाश्च तेन संवर्धिता वय़म् ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
वालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
वालादित्याम्वुजेन्दूनां तुल्यरूपाणि मारिष |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वालानपि च गर्भस्थान्सान्त्वानि समुदाचरन् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
वालानां क्षुद्वलवती जानाम्येतदहं विभो |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
वालानां प्रेक्षमाणानां स्वय़ं भक्षानभक्षय़न् |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
वालानामथ वृद्धानां दासानां चैव ये नराः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
वालान्वृद्धान्वय़ःस्थांश्च न हरेय़मनागसः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
वालान्सुतानण्डगतान्मात्रा सह मुनिर्वने ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
वालान्स्त्रिय़ो वा युष्माकं न हनिष्ये व्यवस्थितान् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५१
जनमेजय़ उवाच
वालाभिरूपस्य तवाप्रमेय़; वरं प्रय़च्छामि यथानुरूपम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
वालामपश्यन्त तदा रुदन्तीं; धात्रेय़िकां प्रेष्यवधूं प्रिय़ाय़ाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
वालामप्राप्तवय़समजातव्यञ्जनाकृतिम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
वालास्त्विमे तैर्विविधैरुपाय़ैः; सम्प्रार्थिता हन्तुममित्रसाहाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
वालिपुत्रोऽङ्गदश्चैव ये चान्ये प्लवगर्षभाः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
वालिशां वुद्धिमास्थाय़ मन्दभाग्यतय़ात्मनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
वालिसुग्रीवय़ोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहय़ोः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वालिसुग्रीवय़ोर्भ्रात्रोर्यथा श्रीकाङ्क्षिणोः पुरा ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
वालुकाभिस्ततः शक्रो गङ्गां समभिपूरय़न् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
वालुकामुष्टिमनिशं भागीरथ्यां व्यसर्जय़त् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
वालेति कृत्वानुनय़ं तवाहं; ददानि नान्यानुनय़ं लभेत |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
वालेन तु न भुञ्जीत परश्राद्धं तथैव च |
८७ क
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
वालेन रूपेण नरर्षभो महा; नथार्चिरूपेण यथामरस्तथा |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
वालेनापि सता तेन कृतं साह्यं जनार्दन ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
वालेनापि सता मोहाद्भृशं सापह्नवान्यपि |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
वालेन्दुमुकुटं पाण्डुं शरच्चन्द्रमिवोदितम् |
११९ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
वालेषु पुत्रेषु कृपणं वदत्सु; तथा वाचमवचिन्वन्ति सन्तः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
वालैः शृङ्गेण पादेन सम्भवत्येव गौर्मखम् ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
वालैः शृङ्गेण पादेन सम्भवत्येव गौर्मखम् |
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
वालैरपि भवन्तस्तैः सर्व एव विशेषिताः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
वालो युवा च वृद्धश्च यत्करोति शुभाशुभम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
जनमेजय़ उवाच
वालो वाक्यं स्थविर इव प्रभाषते; नाय़ं वालः स्थविरोऽय़ं मतो मे |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
वालो वृद्धावमानेन मन्दो मृत्युवशं गतः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
वालोऽपि यः प्रजानाति तं देवाः स्थविरं विदुः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
वालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशां पते |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
सदस्या ऊचुः
वालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां; यश्चाविद्वान्यश्च विद्वान्यथावत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
वालोऽवालः स्थविरो वा रिपुर्यः; सदा प्रमत्तं पुरुषं निहन्यात् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
वाल्मीकिवत्ते निभृतं सुधैर्यं; वसिष्ठवत्ते निय़तश्च कोपः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
वाल्मीकिश्चापि भगवान्युधिष्ठिरमभाषत |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
वाल्यात्प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
वाल्यात्प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
वाल्यात्प्रभृति चारिघ्नस्तानि दुःखानि चिन्तय़न् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२२०
स्वाहो उवाच
वाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
वाल्यात्प्रसुप्तस्य महावलस्य; सिंहस्य पक्ष्माणि मुखाल्लुनासि |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वाल्यादिव त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुषे नृपसत्तम ||
१८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
वाल्याद्वा संशय़ाद्वापि भय़ाद्वाप्यविमोक्षजात् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
वाल्याद्वालेति कृत्वा तत्क्षन्तुमर्हसि मे विभो ||
२३ ख