द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स हन्ता रिपुसैन्यानां दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
स हन्यमाने सैन्ये स्वे मुचुकुन्दो नराधिपः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स हन्यमानो नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतः |
९६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
स हन्यमानो विमुखं पितरं वभ्रुवाहनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
स हरीन्प्रेषय़ामास सीताय़ाः परिमार्गणे ||
३२ ग
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स हस्तिनेवाभिहतो गजेन्द्रः; प्रगृह्य भल्लान्निशितान्निषङ्गात् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स हास्तिनपुरं गत्वा धृतराष्ट्रगृहं यय़ौ |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स हास्तिनपुरं गत्वा भृशमुद्विग्नमानसः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स हास्तिनपुरं प्राप्य नचिराद्द्विजसत्तमः |
१७८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नागभार्यो उवाच
स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स हि कृष्ण महातेजाः श्लाघन्निव ममाग्रतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
स हि क्रुद्धः समर्थस्त्वां पुत्र पीडय़ितुं रुषा |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान्देवानपि महातपाः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
स हि गन्धर्वलोकस्थ उर्वश्या सहितो विराट् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स हि तं समरे राजन्विजित्य विजय़ोऽर्जुनः |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
स हि तस्मिन्समुत्पन्ने व्रह्महत्याकृते भय़े |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
स हि तां तर्कय़ामास रूपतो नृपतिः श्रिय़म् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
स हि तां पूरय़ामास लक्ष्म्या लक्ष्मीवतां वरः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
स हि तादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययनजन्मना |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
स हि तान्याजय़ामास सर्वान्नृपतिसत्तमान् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
स हि तीव्रेण वेगेन गदापाणिरपाक्रमत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
स हि तेन पुरा विप्रो राज्ञा नात्यर्थमानितः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स हि तेषां महावीर्यो द्वीपोऽभूत्सुमहावलः ||
७१ ग
वन पर्व
अध्याय
७९
जनमेजय़ उवाच
स हि तेषां महेष्वासो गतिरासीदनीकजित् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
स हि तेषामतिय़शा देवानामिव वासवः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
स हि तैः सम्परित्यक्तस्तेन घोरेण कर्मणा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
स हि त्यागेन राज्यस्य न शमं समुपेष्यति |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
स हि दिव्यास्त्रविद्राजा सखा चाङ्गिरसो नृपः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
स हि दिव्यास्त्रसम्पन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसम्भ्रमः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
स हि दीर्घतमा नाम नाम्ना ह्यासीदृषिः पुरा ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
स हि देवासुरे युद्धे दैत्यानां भीमकर्मणाम् |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
स हि देवोऽत्यगाद्देवांस्तपसा विक्रमेण च |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स हि द्रोणं च भीष्मं च कर्णं च रथिनां वरम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
स हि द्वादश वर्षाणि वसिष्ठस्यैव तेजसा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
स हि धर्मं च सत्यं च त्यक्त्वा चरति दुर्मतिः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
स हि धर्मः सुपर्याप्तो व्रह्मणः पदवेदने |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
स हि धर्मार्थमुत्पन्नो व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
स हि नानाविधैर्वाणैरिष्वासप्रवरो युधि |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
स हि नाराय़णो ज्ञेय़ः सर्वात्मा पुरुषो हि सः |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
स हि नाय़ुध्यत तदा दशाहानि महाय़शाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
स हि नित्यमनीकेषु युध्यतेऽभय़मास्थितः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान्पृतनागतान् |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
स हि परमगुरुर्भुवनपति; र्धरणिधरः शमनिय़मनिधिः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स हि पारं महानासीत्पुत्राणां मम सञ्जय़ |
३९ क