chevron_left  वासुदेवार्जुनौarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवार्जुनौ शक्र निवोधेदं वचो मम ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवार्जुनौ शर्वं तुष्टुवाते महामती ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवार्जुनौ श्रुत्वा निनादं तस्य शुष्मिणः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
वासुदेवाश्रय़ो मर्त्यो वासुदेवपराय़णः |
१३० क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवे गते राजन्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |
७१ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिसत्तमम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
वासुदेवेन च तथा श्रेय़ो नैवाभिपद्यसे ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
वासुदेवेन तत्कर्म तथाय़ुक्तं महत्कृतम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
वासुदेवेन तीर्थेन कुलं रक्षितुमर्हसि ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवेन तीर्थेन क्षिप्रं संशाम्य पाण्डवैः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवेन तीर्थेन तात गच्छस्व सङ्गमम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवेन सहिता मङ्गलार्थं यय़ुर्वहिः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
शल्य उवाच
वासुदेवेन हि समं नित्यं मां स हि मन्यते ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ||
९७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
वासुदेवो महद्भूतं सम्भूतं सह दैवतैः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
दुर्योधन उवाच
वासुदेवो महद्भूतं सर्वलोकेषु कथ्यते |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवो महातेजास्ततो वचनमाददे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवो महावाहुर्धनञ्जय़मभाषत ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवो महावुद्धिः कार्यवत्तामचिन्तय़त् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवो रथात्तूर्णमवतीर्य महाद्युतिः |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमव्रवीत् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमव्रवीत् ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापय़िता तथा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
वासुदेवो वृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवोऽथ दाशार्हो वलदेवः ससात्यकिः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवोऽपि तद्युक्तं पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
वासुदेवोऽपि दुर्धर्षो यतात्मा यत्र पाण्डवः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह |
७२ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
वासुदेवोऽप्ययं दृष्टः सर्वमेतद्यथातथम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
वासुदेवोऽर्चनीय़ो वः सर्वलोकमहेश्वरः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
वासुदेवोऽव्रवीद्वाक्यं घटोत्कचमिदं तदा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
वासो दत्त्वा चन्द्रमसः स लोकं; दत्त्वा हिरण्यममृतत्वमेति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
वासो यथा रङ्गवशं प्रय़ाति; तथा स तेषां वशमभ्युपैति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
वासो यथा रङ्गवशं प्रय़ाति; तथा स तेषां वशमभ्युपैति ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
वासोभिरन्नपानैश्च पूजय़ामास भारत ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसत्कृताम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
वासोभिर्विविधैश्चैव योजय़ामास हृष्टवत् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
वासोभिश्च महाशैलः कल्पवृक्षैश्च सर्वशः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
वासोऽय़मिह कालं तु किय़न्तं नौ भविष्यति ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
वास्तुं सुवास्तुं गौरीं च कम्पनां सहिरण्वतीम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
वास्यैकं तक्षतो वाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
वास्यैकं तक्षतो वाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
वासय़न्त्यतिथीन्नित्यं नित्यं ये चानसूय़काः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
वासय़ेः पाण्डवेय़ांश्च कुन्तीं च ससुहृज्जनाम् ||
१३ ख