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कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
वद्धाः सादिध्वजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कशाः ||
४७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
वद्धाङ्गदमहासर्पं ज्वालामालाकुलाननम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
वद्धापीडांश्चारुरूपांश्च यूनो; व्यूढोरस्कांस्तालमात्रान्ददर्श ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
वद्धारिष्टा वद्धकक्ष्या वद्धध्वजपताकिनः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
वद्धासिः सतनुत्राणः प्रगृहीतशरासनः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
वद्धासय़ः पाशहस्ता वारणप्रतिवारणाः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
वद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वीं निपपात तदम्भसि ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वा किल त्वां दास्यन्ति कुन्तीपुत्राय़ कौरवाः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
वद्ध्वा च भृकुटीं वक्त्रे क्रोधस्य प्रतिलक्षणम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
वद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनय़ा यथा ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
वद्ध्वा तु कवचं तस्य मन्त्रेण विधिपूर्वकम् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासेय़ुर्वसुन्धराम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वा दुःशासनं चापि पाण्डवेभ्यः प्रय़च्छत ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
वद्ध्वा पाञ्चालराजानमानय़िष्यामहे गृहान् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
वद्ध्वा वा निकृतिप्रज्ञं धार्तराष्ट्रं सुदुर्मतिम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वा वृक्षेषु वलवानाश्रमस्य समन्ततः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
वद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वा ह्रिय़न्ते गन्धर्वै राजदाराश्च सर्वशः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
वद्ध्वात्मानं निपतितो विपाशः पुनरुत्थितः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
वद्ध्वैनं कृष्ण गङ्गाय़ां प्रक्षिप्य पुनराव्रजत् ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
वधं कर्णस्य सङ्ग्रामे दीर्घकालचिकीर्षितम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी |
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
वधं चैषां करिष्यन्ति दैवय़ुक्ता महावलाः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
वधं वै कर्णवृत्राभ्यां कथय़िष्यन्ति मानवाः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
वधं वै कामशास्त्रस्य स दुःखान्यतिवर्तते ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
वधं संस्मृत्य ते वीरा नातिप्रमनसोऽभवन् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
वधं हि क्षत्रवन्धूनां धर्ममाहुः प्रधानतः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
वधः सङ्ख्ये द्रवश्चैव शस्त्राणां च विसर्जनम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
वधदण्डेन ते क्लेश्या न पुरोऽहितसम्पदा ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
वधप्राप्तं तु तं राजन्नावधीत्सूतनन्दनः |
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
वधप्राप्तं तु माद्रेय़ं नावधीत्समरेऽरिहा |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वधप्राप्तौ मन्यते नौ प्रवेश्य शरवेश्मनि |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
वधमाचार्यमुख्यस्य प्राप्तकालं महात्मनः ||
१३६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वधमाशास्य पार्थानां मय़ास्त्रं सृजता रणे ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
वधवन्धपरिक्लेशाः क्रय़ो विक्रय़ एव च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
वधवन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्ते च पुनः पुनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
वधवन्धपरिक्लेशो नित्यमर्थवतां भवेत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
वधवन्धभय़ाच्चापि स्वय़ं गुप्ता भवन्ति ताः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
वधवन्धभय़ादेके मोक्षतन्त्रमुपागताः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
वधवन्धविरोधेन कारय़न्ति दिवानिशम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
वधश्च भरतश्रेष्ठ काले शस्त्रेण संय़ुगे ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
वधाद्वन्धाद्भय़ाद्वापि लोभाद्वापि जनार्दन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
वधान समरे राम यदि योद्धुं मय़ेच्छसि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
महेश्वर उवाच
वधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर ||
६२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
वधाभिनन्दिनः क्रूरान्धार्तराष्ट्रान्मिमर्दिषुः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
युधिष्ठिर उवाच
वधाभिप्राय़माय़ान्तमवधीस्त्वं महावलम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
वधार्थं चास्य समरे साय़कं सूर्यवर्चसम् |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
वधार्थं तव पुत्राणां तत्पक्षं ये च सङ्गताः ||
१८ ख