chevron_left  वाय़सश्चैवarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
वाय़सश्चैव मे राजन्नन्तकाय़ाभिसंहितः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
वाय़सो दश वर्षाणि ततो जाय़ति कुक्कुटः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुः शैघ्र्यमथो जह्याद्धिमवांश्च परिव्रजेत् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
वाय़ुः समुत्कर्षति गर्भय़ोनि; मृतौ रेतः पुष्परसानुपृक्तम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुज्वालो वाय़ुरेता वाय़ुचक्रश्च वीर्यवान् |
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुना क्षोभितावर्ता गङ्गेवोर्ध्वतरङ्गिणी ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
वाय़ुना चैव महता पक्षवातेन चानिशम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुना द्विपदां श्रेष्ठ प्रथितो जगदाय़ुषा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
वाय़ुना धम्यमानोऽग्निर्दृश्यतेऽत्र क्वचित्क्वचित् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
वाय़ुना धूय़मानो हि वनं दहति पावकः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
वाय़ुना विहता मेघा न भवन्ति वलाहकाः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
वाय़ुना सपरीवारस्तेन तिष्ठस्यसंशय़म् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुनेव महाचैत्यः सम्भग्नोऽमिततेजसा |
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुनेव विधूतानि तवानीकानि सर्वशः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुपुत्रः प्रहृष्टोऽभूत्सृक्किणी परिलेलिहन् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
वाय़ुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
वाय़ुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
वाय़ुभक्षस्ततः पश्चाद्वहून्वर्षगणानभूत् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
वाय़ुभक्षो दशग्रीवः पञ्चाग्निः सुसमाहितः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभक्षो निराहारः कृशो धमनिसन्ततः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
सूत उवाच
वाय़ुभक्षो निराहारः शुष्यन्नहरहर्मुनिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभक्षो महावाहुरभवत्पाण्डुनन्दनः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
गौतम उवाच
वाय़ुभक्षोपवासश्च कुशलानि च यानि मे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
वाय़ुभक्षोऽम्वुपिण्याकगोमय़ादन एव च |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
वाय़ुभक्षोऽम्वुभक्षो वा फलमूलाशनोऽपि वा |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
वाय़ुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम् ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रय़त् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
वाय़ुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युत ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुभूतान्यदृश्यन्त संसक्तानीतरेतरम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
वाय़ुमण्डलवद्दृश्यो गच्छेत्सह मरुद्गणैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
वाय़ुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहःक्षपे |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुरग्निस्तथाकाशं ग्रहास्तारागणास्तथा ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
वाय़ुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशय़त्यनय़े स्थितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
वाय़ुरादित्यतस्तांश्च रसान्देवः प्रजापतिः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
वाय़ुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षय़ेत् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुरेकोऽतिगाद्यत्र सिद्धाश्च परमर्षय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
वाय़ुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
वाय़ुर्ज्योतिरथाकाशमापोऽथ पृथिवी तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
वाय़ुर्ज्योतिस्तथा चापः खं गां चैवान्वकल्पय़त् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुर्नित्यं ववौ यत्र नित्यं देवश्च वर्षति |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
वाय़ुर्भीमो भीमनादो महौजाः; सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
वाय़ुर्भूत्वा विक्षिपते च विश्व; मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
वाय़ुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः; प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
वाय़ुर्वै देवदूतोऽस्मि हितं त्वां प्रव्रवीम्यहम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
वाय़ुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुवद्व्यचरद्भीमो वाय़ुपुत्रः प्रतापवान् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः ||
२१ ख