chevron_left  वाय़ुवेगसमस्पर्शाarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुवेगसमस्पर्शा जवे वाय़ुसमांस्तथा |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
वाय़ुवेगसमाः सङ्ख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभाः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुवेगो वाय़ुवलो वाय़ुहा वाय़ुमण्डलः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
वाय़ुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
वाय़ुश्च तेजसा सार्धं वैकुण्ठत्वं ततो मम ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुश्च सुखसंस्पर्शो निष्प्रतीपं च दर्शनम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
वाय़ुसन्धारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुस्ततः प्रादुरभून्नीचैः शर्करकर्षणः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुस्फोटाः सनिर्घाता वर्हिमेघनिभस्वनाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ोः सकाशात्प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
वाय़ोः स्पर्शो रसोऽद्भ्यश्च ज्योतिषो रूपमुच्यते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १६४
इन्द्र उवाच
वाय़ोरग्नेर्वसुभ्योऽथ वरुणात्समरुद्गणात् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
वाय़ोरनिय़मः स्पर्शो वादस्थानं स्वतन्त्रता |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
वाय़ोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते यदा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
वाय़ोरपि विकुर्वाणाज्ज्योतिर्भूतं तमोनुदम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
वाय़ोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
वाय़ोर्गतिमहं व्रह्मन्कीर्तय़िष्यामि तेऽनघ |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
वाय़ोर्वलं विद्धि स त्वं भूतेभ्यश्चात्मसम्भवम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
वाय़ोर्वा सदृशं किञ्चिद्व्रूहि त्वं व्राह्मणोत्तमम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
वाय़ोर्वाय़ुभय़ं ह्युक्तं व्रह्म तत्पीडितं भवेत् ||
५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
वाय़ोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च वहुधा स्मृतः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
वाय़ोस्तेजस्ततश्चापस्त्वद्भ्यो हि वसुधोद्गता |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
वाय़ोस्त्वक्स्पर्शचेष्टाश्च वागित्येतच्चतुष्टय़म् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
वाय़ौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोनुगे |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
वाय़्वग्न्यशनिनिष्पेषैः फलपुष्पं विशीर्यते |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
वाय़्वम्वुफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि |
६१ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
वाय़्वाहाराम्वुभक्षाश्च विंशतिः संनिपातिताः ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
वाय़्वाहारैरम्वुपैर्जप्यनित्यैः; सम्प्रक्षालैर्यतिभिर्ध्याननित्यैः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
वाय़्वीरिताभिः सुमहास्वनाभि; र्द्रुताभिरत्यर्थसमुच्छ्रिताभिः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
विंशकश्चैष सङ्घातो महाभूतानि पञ्च च |
११० क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
विंशतिं सप्त चाष्टौ च हय़मेधानुपाहरत् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
विंशतिः सप्त चैवान्ये लोकपालाश्च सर्वशः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
विंशतिश्च तथा श्लोकाः सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना ||
२११ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
विंशतिश्च तथा श्लोकाः सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना ||
२३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
विंशत्या पुनराहत्य नानारूपैरमर्षणम् |
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
विकचः परुषस्पर्शो विकटोद्वद्धपिण्डिकः |
७ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
विकचः परुषा वाचो व्याहरन्विविधा मुनिः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
विकटः पुरुषो राजन्दीप्तास्यो दीप्तलोचनः |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
विकटश्च समश्चोभौ देवगर्भसमौ नृप ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
विकटाः काललम्वोष्ठा वृहच्छेफास्थिपिण्डिकाः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
विकत्थनः स्पृहय़ालुर्मनस्वी; विभ्रत्कोपं चपलोऽरक्षणश्च |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
विकत्थनस्य भद्रं ते सदा धर्मार्थलोपिनः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
विकत्थमानं समरे राधेय़मरिकर्शनम् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
विकत्थसे मां किं वद्धं कालेन निरपत्रप ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
विकर्णं च महेष्वासं चित्रसेनं च भारत |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं चित्रसेनं च जय़त्सेनं च पार्थिवम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं चित्रसेनं च महावाहुं च कौरवम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं दशभिर्वाणैः पञ्चभिश्च जय़द्रथम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं पञ्चविंशत्या चित्रसेनं च सप्तभिः ||
७ ख