भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं वीक्ष्य निर्भिन्नं तस्यैवान्ये सहोदराः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विकर्णं शंसमानानां सौवलं च विनिन्दताम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
विकर्णं सप्तसप्तत्या निर्विभेद शिलीमुखैः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विकर्णः सहदेवेन चित्रसेनः शिखण्डिना |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विकर्णः सुतसोमं तु विद्ध्वा नाकम्पय़च्छरैः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
विकर्णरथमास्थाय़ मोक्षाय़ाश्वानचोदय़त् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
विकर्णश्चापि निशितैस्त्रिंशद्भिः कङ्कपत्रिभिः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
विकर्णश्चित्रसेनश्च वाह्लीकोऽथ जय़द्रथः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विकर्णस्तु महाप्राज्ञो याज्ञसेनिं शिखण्डिनम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विकर्णस्तु सुतस्तुभ्यं सुतसोमं महावलम् |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
विकर्णस्य ततो भल्लान्प्रेषय़ामास भारत |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
विकर्णेन च वीरेण तथा नन्दोपनन्दकैः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विकर्णो दशभिर्भल्लै राजन्विव्याध पाण्डवम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
विकर्णो वारय़ामास इच्छन्भीष्मस्य जीवितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
विकर्म तद्भवेदन्यत्कर्म यद्यत्समाचरेत् |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
विकर्मणा तप्यमानः पादात्पापस्य मुच्यते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
विकर्मणा तप्यमानः पापाद्विपरिमुच्यते |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
गण्डो उवाच
विकर्मणा प्रमीय़ेत विसस्तैन्यं करोति या ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
विकर्मणि स्थिते विप्रे तां सञ्ज्ञां कुरु पाण्डव ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
विकर्मभिश्च जीवन्ति ते वै निरय़गामिनः ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथञ्चन |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
विकर्मस्थास्तु नोपेक्ष्या जातु राज्ञा कथञ्चन |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
विकर्माणश्च ये केचित्तान्युनक्ति स्वकर्मसु ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ति नृपते त्रय़ः |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विकर्षतश्च गाण्डीवं न किञ्चिद्दृश्यतेऽन्तरम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
विकर्षतो मुञ्चतो वा नान्तरं ददृशू रणे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्तश्च चापानि विसृजन्तश्च साय़कान् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्तो दिशः सर्वाः समीय़ुः सर्वशव्दगाः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशव्दगाः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
विकर्षन्तौ महावेगौ गर्जमानौ परस्परम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्वै धनुः श्रेष्ठं सर्वभारसहं दृढम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्सात्वतश्रेष्ठं क्रीडमान इवाहवे |
५८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
विकल्पा वहवो राजन्नापदां पाण्डुनन्दन |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
विकल्पय़ित्वा राजानं ततः प्राह वृकोदरः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
विकारं न ह्यजनय़त्सुतीक्ष्णमपि तद्विषम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
विकारं प्रकृतिं चैव पुरुषं च सनातनम् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विकिरञ्शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्वुदः ||
१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
विकिरन्व्राह्मणं युद्धे वहुभिर्निशितैः शरैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
विकीर्णमस्त्रं तद्दृष्ट्वा तथा भीमरथं प्रति |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
विकीर्णशस्त्राभरणा विपन्नाश्वरथद्विपाः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
विकीर्णांशुरिवादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
विकीर्णान्त्राः सुवहवो भग्नसक्थाश्च भारत |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विकीर्णैः कवचैश्चित्रैर्ध्वजैश्छत्रैश्च मारिष |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
विकीर्णैरग्निहोत्रैश्च भूर्वभूव समावृता ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विकुण्ठनः खलु दाशार्हीमुपय़ेमे सुदेवां नाम |
३८ क