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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
विकुर्वते प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्ततः |
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
विकुर्वन्वहुधा वर्णान्नीलपाण्डुरलोहितान् ||
४६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
विकुर्वाणः प्रकृतिमानभिमन्यत्यवुद्धिमान् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
विकुर्वाणा वृहन्तोऽश्वाः श्वसनोपमरंहसः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
विकुर्वाणो मुनीनां तु चरमाणो महीमिमाम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
विकुर्वाणौ कथाश्चित्राः प्रीय़माणौ विशां पते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
विकृतस्यास्य राजर्षे निखिलेन नरर्षभ ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
विकृतस्वररूपाणि भृशं सर्वाण्यचोदय़न् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
विकृता विकृताकारा विकृताभरणध्वजाः ||
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः |
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
विकृताय़ुधभूय़िष्ठा वाय़ुवेगसमा जवे ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
विकृतीनां लय़ानां च सा गतिस्त्वं सनातन ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
विकृतेन च मे दत्तं विशूद्धेनान्तरात्मना ||
९२ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
विकृतैर्दर्शनैरन्ये समुत्पेतुः सहस्रशः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
विकृतैर्विकृताकारैः क्रीडद्भिः पृथिवीपते |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
विकृष्टरागं वहुमानिनं चा; प्येतान्न सेवेत नराधमान्षट् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य कार्मुकं घोरं भारसाधनमुत्तमम् |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य कार्मुकं घोरं वेगघ्नं भारसाधनम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य च धनुश्चित्रमाकर्णात्परवीरहा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य च महातेजा व्यसृजत्साय़कान्नव ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य चापं समरे भारसाधनमुत्तमम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
विकृष्य चिक्षेप वहून्नाराचान्मर्मभेदिनः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य वलवच्चापं क्रोधेन प्रहसन्निव ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य वलवच्चापं तव पुत्राय़ सोऽसृजत् ||
४३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
विकृष्य वलवच्चापमा कर्णादतिमारुतिः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
विकृष्यमणैर्जवनैरलङ्कृतै; र्हतेश्वरैराजिरथैः सुकल्पितैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं जनेश्वर |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
विकृष्यमाणांस्तेनैवं धनुर्मध्यगताञ्शरान् |
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
विकोशान्सुत्सरूनन्ये कृतधारान्समाहितान् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
विकोशैर्विमलैः खड्गैरभिजघ्नुः परान्रणे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
विकोशौ चाप्यसी कृत्वा समरे तौ विचेरतुः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रिय़स्य विशां पते |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
विक्रमं भुजय़ोर्वीर्यं धैर्यं च विदितात्मनः |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
विक्रमं मम पश्यन्तु धनुषश्च महद्वलम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १४०
भीम उवाच
विक्रमं मे यथेन्द्रस्य साद्य द्रक्ष्यसि शोभने |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमं वृत्रहा जह्याद्धर्मं जह्याच्च धर्मराट् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
विक्रमन्तो म्रिय़न्ते च यौवनस्थास्तथापरे ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
विक्रमश्रुतमाहात्म्यैः कथमाय़ोधने हतः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
विक्रमस्य न कालोऽय़ं नहुषो वलवत्तरः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
विक्रमस्व महावाहो जहि शत्रूनरिन्दम ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमाधिगता ह्यर्थाः क्षत्रधर्मेण जीवतः |
७८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
विक्रमाधिगता ह्यर्थाः क्षत्रधर्मेण जीवतः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
विक्रमार्थमहं जातो यशोर्थं च तथैव च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युङ्क्ते स योगतः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
विक्रमे गमने भारे नैषामस्ति परिश्रमः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमे चाप्यपर्याप्ताः पाण्डवान्प्रति भारत ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
विक्रमेण गुणैश्चैव पितेवासीत्स पार्थिवः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान्पाकशासनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमेण त्रय़ो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ||
५९ ख