chevron_left  विक्षरन्तंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
विक्षरन्तं यथा मेघं परवारणवारणम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रोऽभवन्नृपः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
विक्षरो वलवीरौ च वृत्रश्चैव महासुरः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
विक्षाभुजो निवर्तन्तां व्राह्मणा यतय़श्च ये |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
विक्षिपन्गाण्डिवं राजन्वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
विक्षिपन्नादय़ंश्चापि धनुःश्रेष्ठं महावलः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
विक्षिपन्सुमहच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
विक्षिपेमां रजोवृष्टिं तवैतत्कर्म मारुत ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
विक्षिप्तमष्टचक्रेण विवृताक्षेण कूजता |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
विक्षोभ्याम्भोनिधिं तार्क्ष्यस्तं नागमिव चाक्षिपत् ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
विक्षोभय़न्तं सेनां ते त्रासय़न्तं च पार्थिवान् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
विक्षोभय़न्तः सलिलमुत्थिताः शतय़ोजनम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
विक्षोभय़न्तौ तत्सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विक्षोभय़ित्वा च पुनः कर्णमेवाभिदुद्रुवुः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
विख्यातं त्रिषु लोकेषु व्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम् ||
२७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
विख्यातमादित्यसमस्य लोके; त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
विख्यातो हिमवान्पुण्यः शङ्करश्वशुरो गिरिः |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
विख्यापितं वलं वाह्वोस्त्रिषु लोकेषु सञ्जय़ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
विख्याप्य वीर्यं सर्वेषु लोकेषु वदतां वरः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विगतक्रोधमात्सर्याः सर्वे विगतकल्मषाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
विगतभय़कषाय़लोभमोहो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
विगतासूनि सर्वाणि सत्त्वानि विविधानि च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
विगते वातवर्षे च निश्चक्राम गुहामुखात् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
विगतेच्छाभय़क्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
विगर्भामकरोच्छक्रो यत्र जातो मरुद्गणः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां; सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
विगर्हमाणः कौरव्य वेषग्रहणकारणात् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
विगर्हमाणा गान्धारी समर्थं वाक्यमव्रवीत् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
विगर्हय़ामास तदा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
विगलितमिव चाम्वरान्तरे; तपनमरीचिविभासितं वभौ ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
विगाढा रजनी चेय़ं निवृत्तश्च दिवाकरः ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
विगाढाय़ां रजन्यां च राजा दैन्यं परं गतः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
विगाढे युधि सम्वाधे वेत्स्यसे मां जनार्दन ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
विगाढे रजनीमध्ये शक्रप्रह्रादय़ोरिव ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
विगाढे शस्त्रसम्पाते परवीररथारुजौ |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
विगाहति ह्यनालम्वमन्धकं वै सनातनम् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
विगाहन्स रथानीकमश्वसङ्घांश्च फल्गुनः |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
विगाहिता कृष्णसमः कृतास्त्र; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३४
उत्तर उवाच
विगाह्य तत्परानीकं गजवाजिरथाकुलम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
विगाह्य तद्गजानीकं भीमसेनोऽपि पाण्डवः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
विगाह्य तरसा शूरः स्नानं चक्रे परन्तपः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः; कामाय़ जग्राह ततोऽम्वुजानि ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
विगाह्य तौ सुवलिनौ माय़याविशतां तदा ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
विगाह्य रथमार्गेषु वरानुद्दिश्य निघ्नतः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
विगाह्य वाहिनीमध्यं तस्य लोका यथा मम ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
विगाह्य वै निराहारो निर्ममो मुनिवद्भवेत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
विगाह्य वै निराहारो राजलक्ष्मीं निगच्छति ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्वाणैर्भृशविक्षतः |
२९ क