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आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा चैनं स वव्रेऽथ पुत्रार्थं मनुजर्षभ ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्चैव प्राहेदमृषिसत्तमः |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा तु तान्सुविश्वस्ताञ्शय़ानानकुतोभय़ान् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
ज्ञात्वा तु मां सञ्जय़ गर्हय़ेस्त्वं; यदि धर्मं यद्यधर्मं चरामि ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा देय़ा विप्र गवान्तरं हि; दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
ज्ञात्वा नामानि चैतेषां सर्वानेतान्विनाशय़ |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
ज्ञात्वा नय़ानपाय़ांश्च भृत्यतस्ते भय़ानि च |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २७७
सावित्र्यु उवाच
ज्ञात्वा पुत्रार्थमुक्तो वै तव हेतोः पितामहः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा प्रजहि काले त्वं परार्थमनुदृश्य च ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २०७
मार्कण्डेय़ उवाच
ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा युधिष्ठिरो राजा प्राणानपि परित्यजेत् ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा युय़ुत्सुः कार्याणि प्राप्तकालमरिन्दम ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
ज्ञात्वा वलस्थं त्रिदशाधिपं तु; ननाद वृत्रो महतो निनादान् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा विममृशे राजंस्तत्परः परिचिन्तय़न् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा वैकर्तनः कर्णः संरव्धः समय़ोधय़त् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा शूलं च देवेशः पाणिना समनामय़त् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा सत्त्वय़ुतं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ज्ञात्वा सत्यजिता द्रोणं ग्रस्यमानमिवाहवे |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
ज्ञात्वा स्वविषय़ं तं च सामादिभिरुपक्रमेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
ज्ञात्वात्मस्थं हरिं चैव निवर्तन्ते न तेऽव्ययाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ज्ञात्वैकं भूतभव्यादिं सर्वभूतभवोद्भवम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
ज्ञात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थं सव्यसाचिनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
ज्ञातय़ः सम्प्रवर्धन्ते सरसीवोत्पलान्युत ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
ज्ञातय़श्च हि भूय़िष्ठाः सहाय़ा गुरवश्च नः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
ज्ञातय़स्तारय़न्तीह ज्ञातय़ो मज्जय़न्ति च |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
ज्ञातय़स्त्वानुजीवन्तु सुहृदश्च परन्तप ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातय़ो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
ज्ञातय़ो वर्धनीय़ास्तैर्य इच्छन्त्यात्मनः शुभम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातय़ो वा वदिष्यन्ति पाण्डवार्थाय़ कर्हिचित् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
ज्ञातय़ो विनिवर्तन्ते प्रेतसत्त्वादिवासवः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
ज्ञातय़ो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनच्युतम् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
ज्ञानं कृतमवीजं ते कथं तेनेह भिक्षुणा ||
१७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
ज्ञानं कृतमवीजं मे विषय़ेषु न जाय़ते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किं चि; त्साङ्ख्यागतं तच्च महन्महात्मन् ||
१०४ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
ज्ञानं चैवात्र वुद्धिश्च मनश्च भरतर्षभ |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानं ज्ञेय़ं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानं ज्ञेय़ं तथाज्ञो ज्ञः कस्तपा अतपास्तथा |
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानं ज्ञेय़ं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
ज्ञानं ज्ञेय़ाभिनिर्वृत्तं विद्धि ज्ञानगुणं मनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
ज्ञानं ज्ञेय़ेषु भिन्नेषु यथाभेदेन वर्तते |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेय़ं निष्कलमेव च |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
ज्ञानं तु विज्ञानगुणेन युक्तं; कर्माशुभं पश्यति वर्जनीय़म् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
ज्ञानं त्वेव परं विद्म संन्यासस्तप उत्तमम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
ज्ञानं दिव्यं ममापीदं तेनासि विदितो मम ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
ज्ञानं निःश्रेय़ इत्याहुर्वृद्धा निश्चय़दर्शिनः |
३ क