उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
विचित्रवीर्यं राजानं भृत्यो भूत्वा ह्यधश्चरः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
विचित्रवीर्यं राजानमभ्यषिञ्चं यथाविधि ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजेऽम्विकाम्वालिके काशिराजदुहितरावुपय़ेमे ||
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादय़िष्यति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादय़ेत्प्रजाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्माणं समपद्यत ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्तु तदा भीष्मस्य वचने स्थितः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्तु राजा समभवत् ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः ||
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
विचित्रवीर्यस्य कृते वीर्यशुल्का उपार्जिताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये सम्प्रतिपादनम् |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्य तु कच्चिदद्य; कुरुप्रवीरस्य धरन्ति पुत्राः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः; कृत्वा नृशंसं वत पश्यति स्म ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कनीय़ान्मम पार्थिवः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यो व्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
विचित्रांश्च परिस्तोमान्रत्नानि च सहस्रशः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
विचित्रान्पृतनामध्ये रथमार्गानुदीर्यतः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विचित्रान्मणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्राभरणाः सर्वे विचित्ररथवाहनाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
विचित्राभरणाश्चैव नन्दय़न्तीव मे मनः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमय़ान्वितम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमव्रवीत् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्राय़ुधवर्मिण्या गङ्गय़ेव प्रवृद्धय़ा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
विचित्रिताः काञ्चनपट्टनद्धा; यथा महोल्का ज्वलितास्तथा ताः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रै रत्नवद्भिश्च ऋद्ध्या परमय़ा युतैः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
विचित्रैरर्धचन्द्रैश्च जातरूपपरिष्कृतैः |
७२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विचित्रैश्च परिस्तोमैः पताकाभिश्च संवृता |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
विचित्रैश्च रथैर्भग्नैर्हतैश्च गजवाजिभिः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
विचिनोति च मां तातः सहैवाश्रमवासिभिः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
विचिनोतु यथान्याय़ं विधानं क्रिय़तां तथा ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विचिन्त्य च महाराज ततो वचनमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
विचिन्त्य त्वथ गोविन्दो नापश्यद्यदनावृतम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
विचिन्त्य नाधिगच्छामि गमनाय़ेतराय़ वा ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
विचिन्तय़न्प्रपश्यामि सुसूक्ष्ममपि केशव ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
विचिन्वन्तं मनसा तोष्टुवीमि; किञ्चित्तत्त्वं प्राणहेतोर्नतोऽस्मि |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
विचिन्वन्नेव वाणाग्रैः समासादय़दग्रतः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
विचिन्वन्पूर्वमारूढः शुष्कशाखं वनस्पतिम् |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद्राजवेश्मनि |
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विचुक्रुशुः पितॄनन्ये सहाय़ानपरे पुनः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विचेतव्या मही वीर सग्रामनगराकरा ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः |
९४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
विचेतसस्ते तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
विचेतसो हतोत्साहाः कश्मलाभिहतौजसः |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विचेता न्यपतद्भूमौ सौभद्रः परवीरहा |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
विचेता विह्वलो दीनः किञ्चिद्वचनमव्रवीत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
विचेताः परमोद्विग्नो धृष्टद्युम्नमवेक्ष्य च |
११० क