द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
वधार्थं तस्य जातोऽहमन्येषां च सुरद्विषाम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
वधार्थं तस्य दीक्षा मे न लोकार्थं तपोधनाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
वधार्थं देवशत्रूणां गङ्गाय़ां जनय़िष्यति ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
वधार्थं पाण्डुपुत्रस्य याचितां शक्तिमेव च |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
भीम उवाच
वधार्थं यः समुत्पन्नः शिखण्डी द्रुपदात्मजः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
वधार्थं सूतपुत्रस्य पाण्डवेय़ेन चोदिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
व्रह्मो उवाच
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ चात्मनोऽभ्येति दीपस्य शलभो यथा ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ चात्मनोऽस्माभिः संय़ुगं रोचय़िष्यति |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ तेषां शूराणां पाञ्चालानाममर्षितः ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वधाय़ धार्तराष्ट्राणां निःश्वस्योर्ध्वमुदीक्ष्य च ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ निष्पेतुरुदाय़ुधास्ते; युगक्षय़े केतवो यद्वदुग्राः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
भीष्म उवाच
वधाय़ नीय़मानेषु पितुरेवानुशासनात् ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
वधाय़ मम पुत्राणामात्मनः सगणस्य च ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वधाय़ युधि दैत्यानां रक्षार्थं च दिवौकसाम् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ युय़ुधानस्य दिव्यमस्त्रमुदैरय़त् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
वधाय़ रक्षसस्तस्य वलविप्रकृतास्तदा ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
वधाय़ शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ सगणस्यास्य मामनुज्ञातुमर्हसि ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
वधाय़ानपराद्धानामन्येषां तद्भविष्यति ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
वधाय़ाभिपपातैनां दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
वधाय़ाभ्यद्रवन्भीष्मं सृञ्जय़ाश्च महारथाः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
वधिरान्धौ विकुण्डश्च विरसः सुरसस्तथा ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
वधिष्यसि रणे भीष्मं पुरुषत्वं च लप्स्यसे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
वधिष्यसीति तां देवः प्रत्युवाच मनस्विनीम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
दुर्योधन उवाच
वधिष्यामीति गाङ्गेय़ तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वधूं कुन्तीमुपादाय़ याश्चान्यास्तत्र योषितः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
वधूचतुर्थो वृद्धः स धर्मात्मा निय़तेन्द्रिय़ः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
वधूनां हि विशिष्टा मे त्वं धर्मपरमा सती ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वधूपरिवृतो राजा निर्ययौ भवनात्ततः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वधूभिरुपचारेण पूजिताभुङ्क्त भारत ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
वधूश्च पतिभिः सार्धं निशि सुप्तोत्थिता इव ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
वधूसरेति भगवांश्च्यवनस्याश्रमं प्रति ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
वधे कुन्तीसुतस्याजौ नाचार्य विजय़ो मम |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलाय़ने |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
वधे त्वकुर्वन्यत्नं ते तस्य कर्णमुखास्तदा |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
वधे धृतो वेगवतः प्रमुञ्च; न्नाहं प्रजाः किञ्चिदिवावशिष्ये |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
वधे नूनं भवेच्छान्तिस्तेषां वा फल्गुनस्य वा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
वधे नूनं भवेच्छान्तिस्तय़ोर्वा फल्गुनस्य वा ||
६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वधेन कर्णस्य सुदुःखितास्ते; हा कर्ण हा कर्ण इति व्रुवाणाः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
वधेन च मनुष्याणां मार्गाणां दूषणेन च |
६१ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
वधेन सुनृशंसेन कथं वीरेण पातितः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
वधेनापि न शक्यन्ते निय़न्तुमपरे जनाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
भीष्म उवाच
वधो नाम भवेद्धर्मो नैतद्भवितुमर्हति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
वधो नूनं प्रतिज्ञातो मम गाण्डीवधन्वना |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वधो वन्धः प्रमोक्षश्च सर्वं कालेन लभ्यते ||
८३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
वधो ह्ययं पाण्डव धर्मराज्ञ; स्त्वत्तो युक्तो वेत्स्यते चैवमेषः |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशय़ः ||
४२ ख