वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विचेतुं दक्षिणामाशां राजन्प्रस्थापितास्त्वय़ा ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
विचेरुः सम्प्रहर्षं च नाभ्यगच्छन्महातपाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
विचेरुः सर्वतो राजन्महीं शतसहस्रशः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विचेरुराकाशगताः पार्थवाणविदारिताः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
विचेरुर्न विचेरुश्च राजन्नक्तञ्चरास्ततः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
विचेरुस्ते विनिर्भिद्य नरवाजिरथद्विपान् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विचेलुर्वभ्रमुर्नेदुः पेतुर्मम्लुश्च मारिष ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विचेष्टन्तं यथा नागं मूर्छय़ाभिपरिप्लुतम् ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
विचेष्टन्तश्च दृश्यन्ते निवृत्ताश्च तथैव हि ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
विचेष्टमानस्य च तस्य तानि; कूजन्ति हंसा सरसीव मत्ताः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
विचेष्टमाना धरणीतलस्था; दीना अदृश्यन्त विभग्नचित्ताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
विचेष्टमानां पतितां भूतले पद्मवर्चसम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विचेष्टमानान्कृपणाञ्शोणितेन समुक्षितान् ||
४० ग
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
विचेष्टितुं वा कौन्तेय़ मत्स्यो वाप्यां विशां पते ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विचेष्टय़ति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
विच्छिन्नं भोगमूलं ते किंनिमित्तं हि जीवसि ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि च ||
४४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
विच्छिन्नानि तथा राजन्वलान्यासन्विशां पते ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विजगाहेऽण्डजापूर्णां पद्मिनीमिव यूथपः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
विजङ्घकूवराक्षांश्च विनेमीननरानपि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
विजने चाश्रमस्थेन पुत्रश्चापि समाहितः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
विजहार महादेवो भीमैर्भूतगणैर्वृतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
विजहार मुदा युक्तः स्त्रीत्वं नैवातिरोचय़न् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपासितः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
विजहार वहूनव्दान्देववन्मुदितो भृशम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
विजहारोत्तमाङ्गानि भल्लैः संनतपर्वभिः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
विजह्राते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
विजह्रुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमा महावलाः; पुरे तु पाञ्चालनृपस्य तस्य ह ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमाः कञ्चित्कालमरिन्दमाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु; सरस्वतीशालवनेषु तेषु ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
विजानते चैव न चाहितक्षमे; दमे च शक्ताय़ शमे च देहिनाम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
विजानन्नपि तां प्राप्तिं पप्रच्छ वलसूदनः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
विजानातु नृपो दुःखं यत्प्राप्तं पाण्डुनन्दनैः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
विजानीहि महाराज प्रवीरौ पुरुषर्षभौ ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
विजिगीषून्रणान्मुक्तान्निर्जितारीन्महारथान् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
विजिगीषोस्तथावृत्तमुक्तं चैव तथैव ते |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
विजिग्ये तरसा सङ्ख्ये सेनां चास्य सुदुर्जय़ाम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
विजिग्ये धनुषा राजन्गाण्डीवेन धनञ्जय़ः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रः स शक्यो मानुषैः कथम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा ||
१२ ग
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान्वहून् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
विजिग्ये वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
विजिग्ये सकलं द्वीपं प्रतिविन्ध्यं च पार्थिवम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विजिघांसुं तदाय़ान्तं कुमारः शक्रमभ्ययात् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विजिघांसुर्महासेनमिन्द्रस्तूर्णतरं यय़ौ ||
३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
विजितश्च त्वय़ा मृत्युर्योऽय़ं त्वामनुगच्छति |
७९ क