भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विजितस्तव पुत्रोऽपि भीष्मवाहुव्यपाश्रय़ः |
९७ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
विजितांश्चाप्यमन्यन्त पाण्डवान्धृतराष्ट्रजाः ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विजिताः पुण्यकर्माणो विशिष्टाभिजनश्रुताः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
विजितात्मा तु मेधावी स राज्यमभिपालय़ेत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
विजितात्मा मनुष्येन्द्र यज्ञदानपरो भव ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विजितात्मा विधेय़ात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशय़ः ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
विजिती वीतिहोत्रश्च भवः श्वेतो वृहद्गुरुः |
१७३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
जनमेजय़ उवाच
विजिते पाण्डवेय़ैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
विजिते पाण्डवेय़ैस्तु प्रशान्ते च विशां पते |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
विजितेय़ं धरा कृत्स्ना सव्यसाचिन्परन्तप |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
विजितेय़ं मही कृत्स्ना कृष्णवाहुवलाश्रय़ात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
विजित्य क्षममाणस्य यशो राज्ञोऽभिवर्धते |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
विजित्य च परां भूमिं नाहुः किञ्चन पौरुषम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तं सुखमेधते ||
९२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
ईश्वर उवाच
विजित्य च रिपून्सर्वान्गुणान्प्राप्स्यसि पुष्कलान् ||
१४८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्य चाहवे शूरान्पार्वतीय़ान्महारथान् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
विजित्य नृपतीन्सर्वान्मखैरिष्ट्वा पितामह |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्य पर्वतान्सर्वान्ये च तत्र नराधिपाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
विजित्य पाण्डुपाञ्चालान्भारद्वाजः प्रतापवान् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
विजित्य पृतनामध्ये यय़ौ स्वशिविरं प्रति ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्य युधि कौन्तेय़ो मागधानुपय़ाद्वली ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
विजित्य वा परानाजौ यशः प्राप्स्यामि केवलम् ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्य सङ्ग्रामगतान्भीष्मद्रोणमुखान्कुरून् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
विजित्य समरे योधांस्तावकान्भरतर्षभ |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
विजित्य सर्वसैन्यानि सुमहान्ति महारथाः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
विजित्य सर्वाञ्शत्रून्स रुद्रलोके महीय़ते ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
विजित्य सर्वानसुरान्सुराधिपो; ननन्द हर्षेण वभूव चैकराट् ||
११६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लव्धवानृषिः ||
१२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
विजित्य स्वय़मेष्यावो हतामित्रौ श्रिय़ा वृतौ ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानगमत्प्रभुः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
विजित्यैकरथेनाजौ कन्यास्ता यो जहार ह ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् |
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
विजिहीर्षुरिहाय़ाति तदर्थमपसर्पत ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
विजृम्भत्यम्वरे विप्र किमाश्चर्यतरं ततः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादपावृतात् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
विजेतव्यो यथा वीरः सात्यकिर्यूपकेतुना ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
विजेता नाभवत्कश्चित्कृष्णपाण्डवय़ोर्मृधे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवान्वशी ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
विजेतुं पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्व्रवीमि ते |
८७ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
विजेतुं युधि यद्यस्य स्वय़मिन्द्रः शरो भवेत् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महावलम् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
विजेतुमभिसंरव्ध एक एवातिसाहसात् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
विजेष्यति रणे कर्णमिति मे नात्र संशय़ः ||
३६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्रह्मो उवाच
विजेष्यथ निवर्तध्वं निवृत्तानां शुभं हि वः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
भगवानु उवाच
विजेष्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान्दिवौकसः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
विजेष्यसि रणे सर्वानमित्रान्भरतर्षभ ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति तस्याभवन्मतिः ||
२९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
दुर्योधन उवाच
विजेष्यामो वय़ं सर्वे विश्रान्ता विगतक्लमाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
विजेष्याम्यवशान्सर्वान्व्राह्मणांश्चर्मवाससः ||
१८ ख