शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
विजेष्ये च रणे पार्थान्सोमकांश्च समागतान् ||
३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
विजेष्ये च रणे राजन्सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप |
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप |
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातं वो मय़ा कार्यं तच्च लोकहितं महत् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
युधिष्ठिर उवाच
विज्ञातमिति तत्सर्वमित्युक्तो विदुरो मय़ा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रिय़मात्मनः ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
विज्ञातरूपः स तदा तपःसिद्धेन धन्विना |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
विज्ञातवीर्यैः शक्यमेवं प्रवक्तुं; दृष्टश्चासौ व्राह्मणैर्वादशीलैः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातव्या मनुष्यैस्तैस्तर्कय़ा सुविनीतय़ा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातव्यो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यवुद्धय़ः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
विज्ञातश्च कथं देवैस्तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्य; मुक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे |
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः; पाञ्चालराजो द्रुपदो वरार्हाः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं; न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातोऽसि मय़ा पूर्वं चेष्टञ्शस्त्रपरीक्षणे |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
विज्ञानं मे कथं न स्याद्वुवुधे चात्मसम्भवम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
विज्ञानगुणसम्पन्नास्तेषां च स्पृहय़ाम्यहम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति; तस्मात्सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
विज्ञानमथ विद्यानां न सम्यगिति वर्तते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
विज्ञानवलपूतो यो वर्तते निन्दितेष्वपि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
विज्ञानवलमास्थाय़ जीवितव्यं तथागते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विज्ञानवलमास्थाय़ जीवितव्यं तदा भवेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
विज्ञानानुगतं ज्ञानमज्ञानादपकृष्यते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
विज्ञानाभिनिवेशात्तु जागरत्यनिशं सदा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
विज्ञानार्थं मनुष्याणां मनः पूर्वं प्रवर्तते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
विज्ञानार्थं हि पञ्चानामिच्छा पूर्वं प्रवर्तते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञानेष्वपि चास्त्राणां सौष्ठवे च महावलः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
विज्ञापय़न्ति स्म गुरुं पुनर्वाक्यविशारदाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
विज्ञाय़ कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभय़ं त्यजेत् ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ क्रिय़तां तस्माद्भूय़श्च मृगय़ामहे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
विज्ञाय़ च महाप्राज्ञो मुनिः श्वानं तमुक्तवान् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ तं वलोन्मत्तं वाहुवीर्येण गर्वितम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
विज्ञाय़ तदहं सर्वं माय़यैव व्यनाशय़म् |
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
विज्ञाय़ तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
विज्ञाय़ तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ तेनास्मि तदैवमुक्त; स्तवान्तकालेऽप्रतिभास्यतीति ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ निशि पन्थानं नक्षत्रैर्दक्षिणामुखाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
विज्ञाय़ यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ राजा कौन्तेय़ो यज्ञाय़ैव मनो दधे ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
विज्ञाय़ते ते मनसो न प्रहर्षः; कच्चित्क्षत्तः कुशलेनागतोऽसि |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़न्तां क्वजन्मानः क्वनिवासास्तथैव च ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
विज्ञाय़न्ते हि यैर्वेदाः सर्वधर्मक्रिय़ाफलाः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ातीतवय़सं रुषङ्गुं ते तपोधनाः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
विज्ञाय़ाहितमात्मानं योगांश्च विविधान्नृप |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ेदं तथा कुर्यादापदं निस्तरेद्यथा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
विज्ञाय़ेह गतीः सर्वा विरक्तो विषय़ेषु यः ||
४ ख