chevron_left  विज्ञाय़ैतद्विमुच्यन्तेarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
विज्ञाय़ैतद्विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
विज्ञाय़ैतन्निशाय़ुद्धं जिघांसुर्भीममाहवे ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
विज्ञेय़ं वलकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
विज्ञेय़ं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मनः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
विज्ञेय़ं व्राह्मणैर्नित्यं धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
विज्ञेय़ा लक्षणैर्दुष्टैः स्वगात्रसहजैर्नृप ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
विज्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
विज्वरः पूतपाप्मा च वासवोऽभवदात्मवान् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
विजय़ं च महद्दिव्यं ममापि धनुरुत्तमम् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
विजय़ं तु धनुःश्रेष्ठं विधुन्वानो महारथः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
विजय़ं लभते नित्यं सेनां सम्यक्प्रय़ोजय़न् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
विजय़ं वसुषेणस्य घोषय़न्तु च पाण्डवाः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
विजय़स्ते ध्रुवं पार्थ प्रिय़ं काममवाप्नुहि ||
६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
विजय़स्य च तत्कर्म गान्धारविषय़े तदा |
३ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
विजय़स्य ध्वजस्थश्च नादान्मोक्ष्यामि दारुणान् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
विजय़ाद्यदनुप्राप्तं माधवेन यशस्विना ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
विजय़ाय़ प्रय़ास्यामि दिशं धनदरक्षिताम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
विजय़ाय़ाशु निर्याहि प्रतपन्रश्मिमानिव |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
विजय़ी च रणे नित्यं भैरवास्त्रश्च पाण्डवः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
विजय़ी ह्यर्थवान्धर्ममाराधय़ितुमुत्तमम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
विजय़े कृतसङ्कल्पा मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
विजय़े धृतसङ्कल्पाः समभित्यक्तजीविताः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
विजय़ेत पुमान्कश्चिदपि साक्षाच्छतक्रतुः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
विजय़ो धर्मय़ुक्तश्च तथार्थविजय़श्च ह ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
विजय़ो ध्रुव एवास्तु विजय़स्य महात्मनः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
विजय़ो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
विजय़ो नावसीदेत इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
विजय़ो मन्त्रमूलो हि राज्ञां भवति भारत |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
विजय़ो मे ध्रुवं राजन्फलं पाणाविवाहितम् |
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
विजय़ो वै ध्रुवं कृष्ण धर्मराजस्य दृश्यते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
विडालः सप्त मासांस्तु ततो जाय़ति मानवः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
विडालकुव्जास्तनवस्तनुकेशास्तनुत्वचः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विडालमत्ति श्वा राजञ्श्वानं व्यालमृगस्तथा ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
विडूरथश्च कङ्कश्च समीकः सारमेजय़ः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
विडूरथस्तु मागधीमुपय़ेमे सम्प्रिय़ां नाम |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
वितण्डालापसंलापैर्हुतय़ाचितवन्दितैः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वितते यज्ञवाटे वै समेतेषु द्विजातिषु ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
विततोऽय़ं क्रतुर्वीर न हि मेऽत्र विचारणा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
वितत्य शरजालेन प्रजहास धनञ्जय़ः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
वितत्यस्य सुतः सत्यः सन्तः सत्यस्य चात्मजः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
वितत्रास तदा वाली शरेणाभिहतो हृदि ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
वितथं तु वदेय़ुर्ये धर्मं प्रह्लाद पृच्छते |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
व्यास उवाच
वितथं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
वितथांस्तान्समालक्ष्य पतितांश्च महीतले |
६६ क
विराट पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
वितर्कय़न्तं तु नरर्षभस्तदा; युधिष्ठिरोऽभ्येत्य विराटमव्रवीत् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
वितस्थे सोऽन्तरिक्षेऽथ हृदय़ेन विदूय़ता |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
वितानेन विचित्रेण सर्वतः समवस्तृतः ||
१७ ख