द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
धनूंषि ते विधुन्वानाः शतशोऽथ सहस्रशः |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
धनूंषि तेषामिषुधीन्हय़ान्ध्वजा; न्रथांश्च सूतांश्च धनञ्जय़ः शरैः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
धनूंषि वाणानिषुधीर्धनुर्ज्याः; पाणीन्भुजान्पाणिगतं च शस्त्रम् |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
धनूंषि वाणान्परिघानसितोमरपट्टिशान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
धनूंषि विस्फारय़तां नृपाणां; वभूव शव्दस्तुमुलोऽतिघोरः |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
धनूंषि समिधस्तत्र पवित्राणि शिताः शराः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
धनूंषि सशरावापान्यपातय़त भूतले ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
धनूंष्यन्ये व्याक्षिपन्त ज्याश्चाप्यन्ये तथाक्षिपन् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
धनूंष्यश्वान्निय़न्तॄंश्च ध्वजान्वाहूंश्च साङ्गदान् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
धनूंष्येतानि मा भैस्त्वं शरीरं नात्र विद्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
धने सुखकला काचिद्धर्मे तु परमं सुखम् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
धने सुखकला या च सापि दुःखैर्विधीय़ते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते; वलेन किं येन रिपून्न वाधते |
९१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
धनेन क्राय़को हन्ति खादकश्चोपभोगतः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
धनेन जय़ते लोकावुभौ परमिमं तथा |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
धनेन तृषितोऽवुद्ध्या भ्रूणहत्यां न वुध्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
धनेन महता चैव वुद्धिरस्य विलोभ्यते ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
धनेन वहुना क्रीत्वा सम्प्रलोभ्य च वान्धवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
धनेन वैश्यः शूद्रश्च मन्त्रैर्होमैश्च वै द्विजः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
धनेनाधर्मलव्धेन यच्छिद्रमपिधीय़ते |
६० क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
धनेनानेन वैदर्भी जितेन समलङ्कृता |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
धनेश्वरं व्यपदिशन्कथं त्विह न लज्जसे ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
धनेश्वरस्यानुचरो वरदोऽस्मि नृपात्मजे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
धनैर्विशिष्टान्मतिशीलपूजिता; न्गुणोपपन्नान्युधि दृष्टविक्रमान् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
धनैश्च वस्त्रै रत्नैश्च गोभिश्च समतर्पय़त् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
धनैश्वर्याधिकाः स्तव्धास्त्वद्गुणैः परमावराः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
धनोत्सर्गेऽपि च कृते न त्वां क्रोधः प्रधर्षय़त् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
धनौघं पुरुषव्याघ्रो वलेन महता वृतः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
धन्यं पश्चान्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
धन्यं यशस्यं पुत्रीय़ं पितृय़ज्ञं परन्तप ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यं यशस्यं पुत्रीय़माय़ुष्यं विजय़ावहम् |
१०१ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं कीर्तय़िष्यामि तेऽनघ ||
२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं जलदानं विशां पते |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं पुण्यं वेदैश्च सञ्ज्ञितम् |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं स्वपक्षोद्भावनं शुभम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं स्वर्ग्यं पुण्यं तथैव च |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् |
९४ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यं वः पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
धन्यः कुन्तीसुतो राजा यस्य ग्रहणमिच्छसि |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
धन्यः कुन्तीसुतो राजा सुजाता चास्य धीमतः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
धन्यः स्यां यद्यहं भूय़ः सौम्य व्राह्मणकोऽपि वा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यस्ते पुत्र जनको देवो भानुर्विभावसुः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमाय़ोधने हतः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
धन्या त्वमसि पाञ्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
धन्या त्वमसि वाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां पुनर्यौवनगे मुखे |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां भूमौ संसर्पमाणकम् |
२० क