chevron_left  अथान्यैर्निशितैर्वाणैःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
अथान्यैर्निशितैर्वाणैः सुषेणं दीर्घलोचनम् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अथान्योन्यस्य संय़ोगाच्चातुर्वर्ण्यस्य भारत |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
अथान्वेषत्प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अकृतव्रण उवाच
अथापगेय़ं भीष्मं तं रामेणेच्छसि धीमता |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
अथापरं चाविदितं चरेथाः; सर्वैः सह भ्रातृभिश्छद्मगूढः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत्पुनर्महत् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां पुनः प्रभुः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अथापरः शिष्यस्तस्यैवाय़ोदस्य धौम्यस्य वेदो नाम ||
७९ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अथापरः शिष्यस्तस्यैवाय़ोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम ||
३२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं प्रभुम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अथापरान्महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अथापराभ्यां भल्लाभ्यां पीताभ्यामरिमर्दनः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अथापराह्णे तस्याह्नः परिवार्य महारथैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
अथापराह्णे तस्याह्नः प्रावात्पुण्यः समीरणः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अथापरे जनपदा दक्षिणा भरतर्षभ ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
अथापरे द्रौणिशराहता द्विपा; स्त्रय़ः ससर्वाय़ुधय़ोधकेतवः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा; हिडिम्वकिर्मीरवकप्रधानाः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अथापरे पुनः शूराश्चेदिपाञ्चालकेकय़ाः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमव्रुवन् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरे महाय़ज्ञान्मनसैव वितन्वते ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरे शरैर्विद्धाश्चक्रवेगेरितास्तदा |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
अथापरे सहस्राणि ये गताः शशविन्दवः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
अथापरेण पार्श्वेन सुष्वाप स महामुनिः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन कुण्डधारं महारथम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन केतुं तस्य महात्मनः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन धनुश्चिच्छेद मारिष |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन मुष्टिदेशे महद्धनुः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन सुमुक्तेन निपातिना |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन सूतपुत्रं स्तनान्तरे |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अथापरेण भल्लेन हेमपुङ्खेन पत्रिणा |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरेण वाणेन ज्वलितेन महाभुजः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अथापरेणास्य जहार यन्तुः; काय़ाच्छिरः संनहनीय़मध्यात् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
अथापरेऽपि राजानः परावृत्य समन्ततः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अथापरैः सप्तदशैर्भल्लैः कनकभूषणैः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
अथापरो भवति हि तं निगृह्य; पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये ||
१२ ग
विराट पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरो भीमवलः श्रिय़ा ज्वल; न्नुपाय़यौ सिंहविलासविक्रमः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु; र्विराटराज्ञस्तुरगान्समीक्षतः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अथापरोऽदृश्यत रूपसम्पदा; स्त्रीणामलङ्कारधरो वृहत्पुमान् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अथापरौ कर्णसुतौ वरार्हौ; व्यवस्थितौ लघुहस्तौ नरेन्द्र |
१०४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अथापलाय़न्त विहाय़ कर्णं; तवात्मजाः कुरवश्चावशिष्टाः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अथापश्यं क्षणेनैव तमेवैरावतं पुनः ||
१०५ ग
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अथापश्यं सात्यकिं तमुपाय़ान्तं महारथम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम् |
११५ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
अथापश्यं हरिय़ुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
अथापश्यत्कन्यां परमरूपदर्शनीय़ां पुष्पाण्यवचिन्वतीं गाय़न्तीं च ||
१० क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अथापश्यत्पुरुषं योगय़ुक्तं; पीताम्वरं लुव्धकोऽनेकवाहुम् ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अथापश्यत्स उदय़े भास्करं भास्करद्युतिः |
२६ क