chevron_left  विदूय़मानैरिवarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
विदूय़मानैरिव सर्वगात्रै; र्ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनैः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
विदेहका मागधाश्च सुह्माश्च विजय़ास्तथा |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
विदेहराजं महिषी दुःखिता प्रत्यभाषत ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगाय़त ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
विदेहराजस्य महीपतेस्तौ; विप्रावुभौ मातुलभागिनेय़ौ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
भीष्म उवाच
विदेहराजाय़ पुरा श्रेय़सोऽर्थे नराधिप ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
शुक उवाच
विदेहराजो याज्यो मे जनको नाम विश्रुतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
विदेहराज्ञः संवादं भार्यया सह भारत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
विदेहराज्यं च तथा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
विदेहानां पुरीं सुभ्रूर्जगाम कमलेक्षणा ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
विदेहावकरोत्पार्थ चैद्यं च वलगर्वितम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा; पार्थं च शक्रप्रतिमं निरीक्ष्य |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत् ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
विद्धश्च वहुभिस्तेन शरैराशीविषोपमैः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
विद्धस्तथाप्यव्यथितो वैष्णवास्त्रमुदीरय़न् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
विद्धाः शरैस्तेऽतिविवृद्धकोपै; र्देवा यथा दैत्यगणैः समेतैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
विद्धानां शतशो राजञ्श्रूय़ते निनदो महान् |
५० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
विद्धि च त्वं नरमृषिमिमं पार्थं धनञ्जय़म् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
विद्धि चन्द्रमसं दर्शे सूक्ष्मय़ा कलय़ा स्थितम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
विद्धि नारद पञ्चैताञ्शाश्वतानचलान्ध्रुवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
विद्धि प्रज्ञानतृप्तं तं ज्ञानतृप्तो न शोचति ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
विद्धि मह्यं सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गौतम उवाच
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निवोध मे ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
विद्धि मां भगवन्कन्यां सदा पितृवशानुगाम् |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
विद्धि मामास्थितं वृत्तं पौरूरवसमुत्तमम् ||
९९ ख
वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
विद्धि सम्प्रस्थितान्सर्वांस्तान्कृष्णे यमसादनम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
विद्धि सृष्टास्त्वय़ा हीमा मा कुप्यासां पितामह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्र प्रपद्यते |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्र प्रपद्यते |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
विद्ध्यक्षहृदय़ज्ञं मां सङ्ख्याने च विशारदम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वामर्होऽस्मि भामिनि |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा च वहुभिर्वाणैर्भैमसेनिमलम्वलः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
विद्ध्वा चान्वसरत्तूर्णं तं मृगं गहने वने ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा तं तु ततस्तूर्णं पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा तानहनत्सर्वान्रथान्रुक्मविभूषितान् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा ननाद पाञ्चाल्यं षष्ट्या पञ्चभिरेव च ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा नवभिरानर्छच्छिताग्रैः प्रपितामहम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा नाकम्पय़त वै मैनाकमिव पर्वतम् ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा नाकम्पय़त्कार्ष्णिं मैनाकमिव पर्वतम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा नाकम्पय़द्वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा पञ्चाशता वाणैः पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा भीमोऽनदद्धृष्टः सैन्धवं च पुनस्त्रिभिः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्ध्वा युगपदव्यग्रस्तय़ोर्वाहानसूदय़त् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा रुक्मरथस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विद्ध्वानदद्द्रौणिः कम्पय़न्निव मेदिनीम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विद्ध्वानदद्धृष्टः पूरय़न्खं समन्ततः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विव्याध विंशत्या कृष्णं पार्थं पुनस्त्रिभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैः स्मय़न्निव ||
३३ ख