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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
जीवतो ये न पश्यन्ति तेषां धर्मविपर्ययः ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
जीवतो यो यथाकालं श्मशाननिधनादिति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
विश्वामित्र उवाच
जीवतो वै गुरून्भृत्यान्भरन्त्वस्य परे जनाः |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
गौतम उवाच
जीवत्वहङ्कृतो वुद्ध्या विपणत्वधमेन सः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
जीवत्सु कौरवेय़ेषु पाञ्चालेष्वथ वृष्णिषु |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु तद्धि सत्यं व्रवीमि ते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु पाञ्चालेष्वथ वृष्णिषु ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
जीवनाशं प्रनष्टानां श्राद्धं कुर्वन्ति मानवाः |
७१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
जीवन्त इव चाप्येते तस्थुः शस्त्रोपवृंहिताः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
जीवन्त इव तत्र स्म व्यदृश्यन्त भय़ार्दिताः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
जीवन्त इव दृश्यन्ते गतसत्त्वा महारथाः ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
जीवन्त इव लक्ष्यन्ते गतसत्त्वास्तरस्विनः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजाः सर्वा युधिष्ठिर |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
जीवन्तं दर्शय़स्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
जीवन्तमानय़ाचार्यं मा वधीरिति धर्मवित् ||
१२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
जीवन्तमानय़ाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
जीवन्तमेनं पश्यामि मनसा नात्र संशय़ः ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मय़ेति ह |
९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
जीवन्ति ते महाराज न चान्योन्यं जहत्युत ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
जीवन्ति ते महाराज नित्यं मुदितमानसाः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
जीवन्ति धनिनो लोके मृता ये त्वधना नराः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
जीवन्त्या ह्यद्य नः प्रीतिर्भविष्यति नराधिप ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
जीवन्धर्मं चरिष्यामि प्रणोत्स्याम्यशुभानि च |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
जीवन्पुण्यमवाप्नोति नरो भद्राणि पश्यति ||
९३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
जीवन्प्राप्नोति पुरुषः सङ्ख्ये जय़पराजय़ौ |
४९ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
जीवन्स शूलमारोहेत्स्वय़ं कृत्वा सवान्धवः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
जीवन्हि कुरुते पूजां विप्राग्र्यः शशिसूर्ययोः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
जीवपुत्रि सुतस्तेऽय़ं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
जीवभूतां महावाहो यय़ेदं धार्यते जगत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
जीवमात्मगुणं विद्धि तथात्मानं परात्मकम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
जीवमात्मगुणं विद्यादात्मानं परमात्मनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
जीवसूर्वीरसूर्भद्रे वहुसौख्यसमन्विता |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
जीवस्तु देहान्तरितः प्रय़ाति; दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
जीवस्तु देहान्तरितः प्रय़ाति; दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
जीवा हि वहवो व्रह्मन्वृक्षेषु च फलेषु च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
जीवाः परे तद्वलवेषरूपा; विधिं स्वकं यान्ति विपर्ययेण ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
जीवाः सम्परिवर्तन्ते कर्मवन्धनिवन्धनाः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
जीवानन्यांश्च वहुशस्तत्र किं प्रतिभाति ते ||
१९ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
जीवामीव हि संस्पर्शात्तव राजीवलोचन ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्राह्मणा ऊचुः
जीवाम्यहं व्राह्मणार्थे सर्वथा सततं प्रभो |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
जीवितं च शरीरं च प्रेत्य वै सह जाय़ते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
जीवितं चार्थहेतोर्वा तत्र किं सुकृतं भवेत् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
जीवितं चिरकालाय़ भ्रातॄणां चाप्यमन्यत ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
जीवितं तव दुष्प्रज्ञ मय़ि सम्प्रति वर्तते |
६५ क
वन पर्व
अध्याय १०१
विष्णुरु उवाच
जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालय़म् ||
८ ख