आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
विद्युज्जिह्वौ महाघोरौ दीप्तास्यौ दीप्तलोचनौ ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विद्युतं मेघमध्यस्थां भ्राजमानामिवाम्वरे |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
विद्युता प्रशमा दान्ता विद्योता रतिरेव च ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विद्युत्प्रकाशं ददृशुः समन्ता; द्धनञ्जय़ास्त्रं समुदीर्यमाणम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां; हर्षोऽर्जुनं चिन्तय़तां वभूव ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युत्सङ्घातदुष्प्रेक्ष्यं विद्युत्सङ्घातपिङ्गलम् |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युत्सङ्घातसदृशं विद्युत्सङ्घातचञ्चलम् ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युदक्षो धनुर्वक्त्रो जठरो मारुताशनः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
विद्युदम्वुदमध्यस्था भ्राजमानेव साभवत् ||
११८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपय़त् ||
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
विद्युद्रूपां महाघोरामाकाशे महतीं गदाम् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
विद्युद्विभ्राजितं चासीत्तिमिराभ्राकुलं नभः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः ||
६८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
विद्यैका परमा दृष्टिरहिंसैका सुखावहा ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
विद्योतमाना विवभौ समन्ताद्दीपमालिनी ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
विद्योतय़न्निवाकाशमद्भुतोपमदर्शनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
विद्रवत्येव तत्सैन्यं पश्यतोर्द्रोणभीष्मय़ोः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विद्रवद्भिश्च वहुधा वलै राज्ञां समन्ततः ||
११६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
विद्रवन्ति च सैन्यानि त्वदीय़ानि दिशो दश ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
विद्रवन्तु दिशो भीताः सिंहत्रस्ता मृगा इव ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात्पक्षिगणा इव |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य च वहूनश्वान्नागा राजन्वलोत्कटाः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य तु कुरून्सर्वांस्तांश्च हत्वा पदानुगान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य तु ततः सैन्यं पाण्डवः शत्रुतापनः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
विद्राव्य शतशो गुल्मान्धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् |
७१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
विद्राव्य सगणान्देवांस्तत्र तत्र तदा तदा |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य सत्यं हन्तास्मि पापं पाञ्चाल्यमेव तु ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तमः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि समन्ततः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
विद्रावय़ंस्तव चमूं शतशो व्यधमच्छरैः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
विद्रावय़िष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतं तत्र तत्सैन्यं दृष्ट्वा भारत सात्यकिः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतं शिविरं दृष्ट्वा साय़ाह्ने राजगृद्धिनः |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतं स्ववलं दृष्ट्वा वध्यमानं महात्मभिः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
विद्रुतां वाहिनीं मन्ये कृतवैरैर्महात्मभिः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतानि च सर्वाणि शिविराणि समन्ततः ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतानि च सैन्यानि शरार्तानि समन्ततः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान्द्विषज्जय़े |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा मन्ये शोचति पुत्रकः ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विद्रुताश्च रणे पेतुः सञ्छिन्नाय़ुधजीविताः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
विद्रुताश्वे रथे तस्मिन्द्रवमाणे समन्ततः |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
विद्रुते त्वय़ि सैन्यस्य नाय़के शत्रुसूदन |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
विद्रुते शिविरे शून्ये प्राप्ते यशसि चोत्तमे |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
विद्रुते शिविरे शून्ये भृशोद्विग्नास्त्रय़ो रथाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ||
४३ ख