अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतेषु च सैन्येषु समानीतेषु चासकृत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
विद्रुतेषु महाराज हय़ेषु वहुधा तदा ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
युधिष्ठिर उवाच
विद्वञ्जिज्ञासमानाय़ दानधर्मान्प्रचक्ष्व मे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
युधिष्ठिर उवाच
विद्वञ्जिज्ञासमानाय़ प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
विद्वञ्जिज्ञासमानाय़ प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विद्वत्तमो वीतभय़ः पुण्यश्रवणकीर्तनः ||
१११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणैः कविसत्तमैः |
१८२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
विद्वद्भिः परिदृष्टोऽय़ं शिष्टो विधिविपर्ययः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
विद्वद्भिरेकीभावश्च प्रातर्होमविधिज्ञता ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वन्क्षत्तर्महाप्राज्ञ त्वं गतिर्भरतर्षभ |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
विद्वांश्चाशीलो वृत्तहीनः कुलीनः; सत्याद्भ्रष्टो व्राह्मणः स्त्री च दुष्टा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचय़ाश्च सुसञ्चिताः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रिय़ाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
विद्वांसस्तत्र भूय़िष्ठा व्राह्मणाश्चावसंस्तदा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
युधिष्ठिर उवाच
विद्वांसो मनुजा लोके कथमेतन्मतं तव ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
विद्वांसो मानय़न्तीह इति मन्येत मानितः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ताः परं भावमनामय़म् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
विद्वांस्तथैव यः शक्तः क्लिश्यमानो न कुप्यति |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वांस्तां वासवीं कन्यां कार्यवान्मुनिपुङ्गवः ||
५७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वांस्त्यागी श्रद्दधानः कृतज्ञ; स्त्यक्त्वा लोकं मानुषं कर्म कृत्वा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
विद्वाञ्जिज्ञासमानैस्त्वं प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
शकुनिरु उवाच
विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
विद्वान्कूर्म इवाङ्गानि कामान्संहृत्य सर्वशः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
विद्वान्प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विद्वान्भूय़स्तरो देवः पूर्णसागरसंनिभः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
युधिष्ठिर उवाच
विद्वान्मूर्खप्रगल्भेन मृदुस्तीक्ष्णेन भारत |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
विद्वान्वन्दी वेदविदो निगृह्य; वादे भग्नानप्रतिशङ्कमानः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वान्वाक्यं नारदस्य प्रशस्य; चक्रे पूजां चातुलां नारदाय़ ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विद्वान्विदुररूपेण धार्मी तनुरकिल्विषी ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
विद्वान्सर्वेषु भूतेषु व्याघ्रमांसोपमो भवेत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भलोभपराय़णम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
विधत्तां भगवानत्रेत्यात्मनो हितकाम्यया ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विधत्स्व प्राप्तकालं यत्कार्यं सिध्यतु चावय़ोः |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
विधत्स्वैषां वलं विष्णो भवानत्र पराय़णम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
विधध्वमत्र यत्कार्यं न स्यात्कालात्ययो यथा ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विधनुःस्यन्दनासिस्तैर्विचक्रश्चारिभिः कृतः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
विधमन्तमनीकानि व्यथय़न्तं महारथान् |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
विधमेदभ्रजालानि यथा वाय़ुः समन्ततः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
विधम्य राक्षसान्वाणैः साश्वसूतगजान्विभुः |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
विधम्य राक्षसान्वाणैः साश्वसूतरथान्विभुः |
९७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
विधवा न भवन्त्यत्र नृशंसो नाभिजाय़ते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
विधवा यस्य विषय़े नानाथाः काश्चनाभवन् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
विधवानाथकृपणान्विकलांश्च वभार सः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
विधवाश्च भवन्त्यत्र नृशंसा जाय़ते प्रजा |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
विधवेव वरारोहा शुष्कतोय़ेव निम्नगा |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येत मे पिता ||
१४ ख