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वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
विधातृविहितं मार्गं न कश्चिदतिवर्तते |
१८७ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
विधातृविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
विधात्रा भृगुशार्दूल क्षुधितस्य वुभुक्षतः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
विधानं तत्र भगवन्कर्तुमर्हसि युक्तितः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विधानं देवविहितं तत्र विद्वान्न मुह्यति |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
व्यास उवाच
विधानं यद्यथाकालं तत्कर्तारो न संशय़ः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
विधानं येन विधिना तिलानामिह शस्यते ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
विधानविहितं पार्थ कथं शर्म भवेत्परैः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
विधानविहितं मत्वा मा विचित्राः कथाः कृथाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
विधास्यामो वय़ं तत्र तवेष्टिं परमाद्भुताम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
विधाय़ न मय़ा चोक्तं सत्यमेतद्गुरोस्तदा ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
विधाय़ योगं पार्थेन संशप्तकगणैः सह |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
विधाय़ रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्ततः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
विधाय़ रक्षां भीष्माय़ समाभाष्य परस्परम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विधाय़ रक्षां लङ्काय़ां विभीषणपुरस्कृतः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
युधिष्ठिर उवाच
विधिं गवां परमहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यं च शास्त्रतः ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
विधिं त्वनशनस्याहुः पार्थ धर्मविदो जनाः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वभूतहिते रतः |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विधिं परममास्थाय़ व्रह्मर्षिविहितं शुभम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
विधिं यज्ञफलैस्तुल्यं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
विधिः शुक्रं वलं चेति त्रय़ एते गुणाः परे ||
१११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
विधिज्ञानां सुमहानेष धर्मो; विधिं ह्याद्यं विधय़ः संश्रय़न्ति ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
विधिज्ञेभ्यो द्विजातिभ्यो ग्राह्यमन्नं विशिष्यते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
विधिज्ञो मृगजातीनां निपानानां च कोविदः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
विधित्सुः कलहस्यान्तं गदां जग्राह पाण्डवः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
विधित्सुः कलहस्यान्तं जिघांसुः कर्णमक्षिणोत् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
विधित्सुः कलहस्यान्तमभिदुद्राव पाण्डवम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
विधित्सुः प्राप्तकालानि ज्ञात्वा परपुरञ्जय़ः ||
६६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान्भवेत् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्नुय़ात् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
विधिना कल्पदृष्टेन यथोक्तेनोपपादितम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
युधिष्ठिर उवाच
विधिना केन जुहुय़ाद्दैवं पित्र्यं तथैव च ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
विधिना परेण कल्याणी दमय़न्ती विशां पते ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
विधिना पालनं भूमेर्यत्कृतं नः पितामहैः ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
विधिना प्रतिजग्राह वेदोक्तेन विशां पते ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
विधिना विधिय़ुक्तानि तारय़न्ति परस्परम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
विधिना विहिते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
श्रीरु उवाच
विधिना वेददृष्टेन चतुर्धा विभजस्व माम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
विधिना वेददृष्टेन तद्भुक्त्वेह न दुष्यति ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
विधिना शास्त्रदृष्टेन हृष्टरूपो विशां पते ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
विधिना श्रामणेनैव कुर्यात्कालमतन्द्रितः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
विधिना सम्प्रय़ुक्तश्च शापाय़ास्य मनो दधे ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
विधिना स्वेन युक्ताभ्यां यथापूर्वं द्विजोत्तम |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
विधिना हि नराः पूर्वं मांसं राजन्नभक्षय़न् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
व्रह्मो उवाच
विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुय़ात् |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
विधिनिय़तमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
विधिपर्यागतानर्थान्प्रज्ञा न प्रतिपद्यते ||
१० ख