chevron_left  विधिपूर्वंarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
विधिपूर्वं च तां राजा कन्यां प्रतिगृहीतवान् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
विधिपूर्वं समानीय़ पार्थिवानभ्यषेचय़त् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
विधिपूर्वं हि सर्वस्य दुःखं वा यदि वा सुखम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
विधिप्रवृत्तान्नरदेवधर्मा; नुक्तान्समासेन निवोध वुद्ध्या |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
जनमेजय़ उवाच
विधिप्रय़ुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान्स्वय़म् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
पितामह उवाच
विधिरेष प्रभावश्च कालः सङ्क्षय़कारकः |
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
विधिर्यः शिविरस्यासीत्पाण्डवानां महात्मनाम् |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
विधिर्विधेय़ं मनसोपपत्तिः; फलस्य भोक्ता तु यथा शरीरी ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
विधिवत्कल्पितं भर्त्रे जय़ेत्युक्त्वा न्यवेदय़त् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
विधिवत्कल्पितं शुभ्रं महाम्वुदनिनादिनम् |
६७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्कारय़ित्वेष्टिं नैष्ठिकीं भरतर्षभ |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
विधिवत्कुशलं पृष्ट्वा ततो व्रह्मर्षिमव्रवीत् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्क्षत्रिय़श्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २८८
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्परिचारार्हं देववत्पर्यतोषय़त् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
विधिवत्पावकं हुत्वा व्रह्मलोके नराधिप ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्पुरुषव्याघ्रः पावकं प्रत्युपाविशत् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवत्पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
युधिष्ठिर उवाच
विधिवत्प्रतिगृह्णीय़ान्न त्वन्यो दातुमर्हति ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
विधिवत्प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽव्रवीत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
विधिवत्सुप्रशस्तेषु वहुमूलफलेषु च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवद्दक्षिणावन्ति यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
विधिवद्दक्षिणावन्ति यदि राजा न पालय़ेत् ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवद्दीक्षय़ामासुरश्वमेधाय़ पार्थिवम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवद्धि ददौ वित्तं व्राह्मणानां महात्मनाम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विधिवद्भोजय़ामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
विधिवद्व्यूह्य मेधावी युद्धाय़ धृतमानसः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
विधिवद्व्रह्मणैः सिद्धैर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
विधिश्च वलवान्राजन्दिष्टस्यास्मि वशे स्थितः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
विधिस्तु वलवान्व्रह्मन्दुस्तरं हि पुराकृतम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
विधिस्तु वलवान्व्रह्मन्प्रवणं हि मनो मम ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
विधीय़तां तथा नीतिर्यथा वध्येत वै परः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
विधीय़ते न शारीरं भय़मेषां कदाचन ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वन्कार्मुकं चित्रं भारघ्नं वेगवत्तरम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वन्गाण्डिवं पार्थो ग्रीवाय़ामभवत्तदा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वन्गाण्डिवं सङ्ख्ये वभौ सूर्य इवोदितः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वन्तश्च चापानि सर्वतः पर्यवारय़न् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
विधुन्वन्नसिमाकाशे दानवान्तचिकीर्षय़ा ||
४९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
नारद उवाच
विधुन्वन्व्रह्मघोषेण रक्षोभय़कृतं तमः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वन्सशरं चापं पाञ्चाल्याभ्यां समागतः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानं महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानः शितैर्वाणैः शिरांस्युन्मथ्य पातय़त् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानो धनुः श्रेष्ठं द्रावय़ाणो महारथान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानो धनुःश्रेष्ठं चोदय़ंश्चैव वाजिनः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानो धनुःश्रेष्ठं व्यभ्राजत महाय़शाः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् |
१११ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
विधुन्वानौ तु तौ वीरौ धनुषी भारसाधने |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे सन्दधानौ च साय़कान् |
३९ क