chevron_left  विनदन्तमभिक्रोशञ्शार्दूलarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
विनदन्तमभिक्रोशञ्शार्दूल इव वारणम् ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विनदन्तो भृशं त्रस्ताः संन्यपेषन्परस्परम् ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
विनदन्तो महात्मानः कम्पय़न्तश्च मेदिनीम् |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
विनदन्तोऽभ्यधावन्त गर्जन्तो जलदा इव ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
विनदन्तौ महाराज सिंहाविव महावलौ ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
विनदन्त्यः स्त्रिय़ः सर्वा निष्पेतुर्नगराद्वहिः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विनदन्पथि शक्रस्तु द्रुतं याति महावलः |
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
विनदन्वाथ वा तूष्णीं व्योम्नि वापरिशङ्कितः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
विनदन्स नरव्याघ्रो नागानीकान्तकृद्रणे ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
सञ्जय़ उवाच
विनद्य च महानादं पर्यष्वजत फल्गुनम् ||
२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
विनद्य सिंहनादं च ज्यां विकर्षन्पुनः पुनः |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
विनद्य सुमहानादं तर्जय़ित्वा मुहुर्मुहुः |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
विनद्योच्चैः सिंह इव स्वान्यनीकान्यचोदय़त् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
विननाद महानादं क्षोभय़न्दैत्यदानवान् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
विननादासकृत्सोऽथ दिवसे दिवसे तदा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १
महाभारत कथा
विनय়ावनतो भूत्वा कदाचित्सूतनन्दनः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
विनर्दन्ति स्म पाञ्चालाः क्ष्वेडन्ति च हसन्ति च |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
विनर्दन्निव चाकाशे वैनतेय़ः प्रतापवान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
विनर्दन्निव तत्रस्थः संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
विनर्दमानो मद्रेशो मेघह्रादो महावलः ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
विनर्दमानोऽतिभृशं सविद्युदिव तोय़दः ||
४० ग
आदि पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
विनश्यते विषय़े तस्य मृत्यु; र्मृत्योर्यथा विषय़ं प्राप्य मर्त्यः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
विनश्यत्स्वपि लोकेषु न भय़ं तस्य जाय़ते |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
विनश्यन्तं विनाशान्ते नावि नावमिवाहितम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
विनश्यन्ति न सन्देहः फेना इव महार्णवे ||
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
विनश्यन्ति न सन्देहस्तद्वद्योगवलादृते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
विनश्यन्त्यनय़ाविष्टा देशाश्च नगराणि च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
विनश्यमानं धर्मं हि यो रक्षति स धर्मवित् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
विनश्येतां न सन्देहो मत्स्याविव जलक्षय़े ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २७८
मार्कण्डेय़ उवाच
विनष्टचक्षुषस्तस्य वालपुत्रस्य धीमतः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
विनष्टमथ वा श्रुत्वा भविष्यन्ति निरुद्यमाः |
३१ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
विनष्टाः कुरुशार्दूल न ताञ्शोचितुमर्हसि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
विनष्टान्कौरवान्मन्ये मम पुत्रस्य दुर्नय़ैः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
विनष्टान्कौरवान्मन्ये सपुत्रपशुवान्धवान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
विनष्टाय़ां दण्डनीतौ राजधर्मे निराकृते |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
विनष्टे त्वय़ि चास्माकं पक्षो हीय़ेत कौरव ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
विनष्टेषु यथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
विनष्टेऽम्भसि राजेन्द्र जाज्वलीत्यनलो महान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
विनष्टैः पाण्डवेय़ैश्च सशैलवनकाननाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
विनष्टोऽपि च तान्येव जन्तुर्भवति पञ्चधा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
विना जनार्दनं पार्थो योगानामीश्वरं प्रभुम् ||
१४ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
विना जनार्दनं वीरं नाहं जीवितुमुत्सहे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
विना तं पुण्डरीकाक्षं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं; वरं द्वितीय़ं वरय़स्व भामिनि ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं; वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
विना मात्रा महातेजा विदार्याण्डमजाय़त ||
४ ख