द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथस्य राजेन्द्र हय़ाः साधुप्रवाहिनः |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभय़ोः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथस्य समरे कृत्वा रक्षां महारथः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथाद्रिं पुरुमित्रगाधं; दुर्मर्षणोदं शकुनिप्रपातम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
जय़द्रथाय़ प्रददौ सौवलानुमते तदा ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथाय़ यात्येष कदर्थीकृत्य नो रणे ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथे च निहते राक्षसे चाप्यलाय़ुधे |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथेन कर्णेन तथा दुःशासनेन च ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
जय़द्रथेन च तथा कुरुभिश्चापि सर्वशः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
युधिष्ठिर उवाच
जय़द्रथेन च पुनर्वनादपहृता वलात् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
जय़द्रथेन पापेन यत्कृष्णा क्लेशिता वने |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथेन सहिता ग्रीवाय़ां संनिवेशिताः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
जय़द्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ||
१२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
जय़द्रथेनापहृता प्रमथ्य; पञ्चेन्द्रकल्पान्परिभूय़ कृष्णा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान्प्रति |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
जय़द्रथो नाम यदि श्रुतस्ते; सौवीरराजः सुभगे स एषः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथो भीमरथः सांय़ात्रिकसभो जय़ः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
वैशम्पाय़न उवाच
जय़द्रथो याज्ञसेनीमुवाच; रथे स्थितां भानुमतीं हतौजाः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथो रणे पार्थं भित्त्वा भारत साय़कैः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथो हतो राजन्किं नु शेषमुपास्महे ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
जय़ध्वं युधि ताञ्शत्रून्सङ्घातो हि महावलः ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
जय़ध्वजो दृश्यते पाण्डवस्य; समुच्छ्रितो वानरराज उग्रः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
जय़न्तं पाण्डवं दृष्ट्वा त्वत्सैन्यं चाभिपीडितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
जय़न्तः पात्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
जय़न्तमिव पौलोमी द्युतिमन्तमजीजनत् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
जय़न्तमिव पौलोमी परिष्वज्य नरर्षभम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
जय़न्तश्चामितौजाश्च सत्यजिच्च महारथः ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
जय़न्तो वध्यमाना वा गतिमिष्टां गमिष्यथ ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
जय़न्तो वध्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
जय़न्तो ह्यपि सङ्ग्रामे क्षय़वन्तो भवन्त्युत ||
३५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
जय़न्त्यल्पतरा येन तन्निवोध विशां पते ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
जय़न्वा वध्यमानो वा प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
जय़माकाङ्क्षमाणा हि कौरवेय़स्य दंशिताः ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
जय़माकाङ्क्षमाणानां शूराणामनिवर्तिनाम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
जय़माशास्स्व मे व्रह्मन्मन्त्रय़स्व च मद्धितम् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
जय़रातमथाक्षिप्य नदन्सव्येन पाणिना |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
जय़रातरथं प्राप्य मुहुः सिंह इवानदत् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
जय़शव्दं ततश्चक्रुर्देवाः सर्वे सवासवाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
जय़शव्दैर्द्विजाग्र्याणां सुभगानर्तितैस्तथा |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
जय़श्च तेऽस्तु भद्रं च प्रय़ाहि पुरुषर्षभ |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
जय़श्च निय़तो राज्ञः स्वर्गश्च स्यादनन्तरम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
जय़श्चैव ध्रुवोऽस्माकं न त्वस्माकं पराजय़ः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
जय़श्चैवोभय़ोर्दृष्ट उभय़ोश्च पराजय़ः |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
जय़स्य हेतुः सिद्धिर्हि कर्म दैवं च संश्रितम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
जय़ाभिवृद्ध्या परय़ाभिपूजितौ; निहत्य कर्णं परमाहवे तदा ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
जय़ार्थं च यशोर्थं च रक्ष राजानमाहवे ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
जय़ार्थं पाण्डुपुत्राणां तथा तेजोवधः कृतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
जय़ार्थमेव योद्धव्यं न क्रुध्येदजिघांसतः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ावती मालतिका ध्रुवरत्ना भय़ङ्करी ||
४ ख