शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ैरुपलव्धार्थान्सर्वान्यस्त्वध्यवस्यति ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
इन्द्रिय़ैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
इन्द्रिय़ैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
इन्द्रिय़ैर्निय़तैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ैर्निय़तैर्वुद्धिर्वर्धतेऽग्निरिवेन्धनैः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
इन्द्रिय़ैर्मनसः सिद्धिर्न वुद्धिं वुध्यते मनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
इन्द्रिय़ैर्विविधैर्युक्तं सर्वं व्यस्तं मनस्तथा ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते वुद्धिसप्तमैः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय़ व्रह्मलोकं गतः प्रभुः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रे ह्यस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि धनञ्जय़ ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
इन्द्रेण गुह्यं निहितं वै गुहाय़ां; यद्भार्गवस्तपसेहाभ्यविन्दत् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
इन्द्रेण तास्त्वनुज्ञाता जग्मुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
इन्द्रेण तु समादिष्टं विद्धि मां दूतमागतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रेण निषधान्प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातय़न् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
इन्द्रेण श्रूय़ते राजन्सभार्येण महात्मना |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
इन्द्रेण समय़े पृष्टो यदुवाच वृहस्पतिः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रय़णं स्मृतम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
इन्द्रेणेदं दस्युवधाय़ कर्म; उत्पादितं वर्म शस्त्रं धनुश्च ||
२७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वधं परमसंय़ुगे |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
इन्द्रो जागर्ति भगवानिन्द्रादग्निर्विभावसुः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
भीष्म उवाच
इन्द्रो दशरथाय़ाह रामाय़ाह पिता तथा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
ऋषय़ ऊचुः
इन्द्रो दिशति भूतानां वलं तेजः प्रजाः सुखम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
इन्द्रो राजा यमो राजा धर्मो राजा तथैव च |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रो वा ते हरिवान्वज्रहस्तः; पुरस्ताद्यातु समरेऽरीन्विनिघ्नन् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रो विवस्वान्पूषा च त्वष्टा च सविता तथा ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
इन्द्रो विवस्वान्सोमश्च विष्णुरापोऽग्निरेव च |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रो वै व्रह्मणः पुत्रः कर्मणा क्षत्रिय़ोऽभवत् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
इन्द्रोतः शौनको विप्रो यदाह जनमेजय़म् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रोपदेशाज्जग्राह ग्रहणीय़ं महीपतिः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रोपमान्पार्थिवपुत्रपौत्रा; न्पश्याविशेषेण हतान्प्रमादात् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक्प्रीतिमाप्नुवन् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
इन्द्रोऽग्निर्यत्र धर्मश्च अजिज्ञासञ्शिविं नृपम् ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
इन्द्रोऽथ धनदो राजा यक्षरक्षोधिपः स च |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
इन्द्रोऽन्यः सर्वदेवानां भवेदिति यतव्रताः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
इन्द्रोऽपि तां नापहरेत्कथं चि; न्मनुष्यमात्रः कृपणः कुतोऽन्यः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रोऽपि देवैः सहितः प्रसहेत कुतो नृपाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रोऽपि विसग्रन्थिमेवाविवेश भूय़ः ||
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
इन्द्रोऽपि हि न पार्थेन संय़ुगे योद्धुमर्हति |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातेन सुरभ्या प्रतिवोधितः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रोऽप्येतन्नोत्सहेत्तात हर्तु; मैश्वर्यं नो जीवति भीमसेने |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
व्राह्मण उवाच
इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानुषा भुवि |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
इन्द्रोऽव्रवीद्भवतु भवानपां पति; र्यमः कुवेरश्च महाभिषेकम् |
३१ क