आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकं नकुलः |
८२ 5
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शतानीकं महाराज श्रुतकर्मा सुतस्तव |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
शतानीकं शरैस्तूर्णं निर्दहन्तं चमूं तव |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
शतानीकं सुतसोमं च भल्लै; रवाकिरद्धनुषी चाप्यकृन्तत् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकः शतं हत्वा विशालाक्षश्चतुःशतम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
शतानीकः सुदशनः श्रुतानीकः श्रुतध्वजः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
शतानीकमथाय़ान्तं नाकुलिं रभसं रणे |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
शतानीकमथाय़ान्तं मद्रराजो महामृधे |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
शतानीकस्ततो दृष्ट्वा भ्रातरं हतवाहनम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकस्तु खलु वैदेहीमुपय़ेमे |
९५ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकस्तु पार्थेभ्यो रथान्राजन्समादिशत् |
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
शतानीकस्तु समरे दृढं विस्फार्य कार्मुकम् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यः कुरुनन्दनः |
७७ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
शतानीकादवरजो मदिराश्वोऽभ्यहारय़त् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
शतानीको जय़त्सेनं विव्याध हृदय़े भृशम् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं; युवा युवानं वृषसेनं शरौघैः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
शतानीकोऽथ सङ्क्रुद्धश्चित्रसेनस्य मारिष |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
शतान्यञ्जनकेशीनां श्वेतानां पञ्च पञ्च च ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्येषु भारत ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
शतान्यमुञ्चद्राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शय़न् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः |
१४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
शतान्याय़ान्ति वेगेन वलिनां भीमतेजसाम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूय़श्च सप्ततिः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
शतावरीं पय़ोष्णीं च परां भैमरथीं तथा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
युधिष्ठिर उवाच
शताय़ुरुक्तः पुरुषः शतवीर्यश्च वैदिके |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
धृतराष्ट्र उवाच
शताय़ुरुक्तः पुरुषः सर्ववेदेषु वै यदा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शताय़ुश्च श्रुताय़ुश्च दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
शते देय़े दशशतं सहस्रे चाय़ुतं तथा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
शते द्वे तु ममाश्वानामीदृशानां द्विजोत्तम |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
शतेन गृध्रवाजानां शराणां नतपर्वणाम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
शतेन च शतं हत्वा पाञ्चालानां महारथः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
शतेन नकुलश्चापि हार्दिक्यं समविध्यत ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वसिष्ठ उवाच
शतेन निष्कं गणितं सहस्रेण च संमितम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
शतेन पार्थं त्वरितो जघान; सहस्रनेत्रप्रतिमप्रभावः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
शतेन शतसङ्ख्येन गवां विनिमय़ेन वै |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
शतेनैकं च विव्याध शतं चैकेन पत्रिणा |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
शत्रवो गुरवः पौरा भृत्या वा स्वजनोऽपि वा ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शत्रवो हतभूय़िष्ठा ज्ञातय़ः परिपालिताः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
शत्रुं कृत्वा यः सहाय़ं विश्वासमुपगच्छति |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
शत्रुं च मित्ररूपेण सान्त्वेनैवाभिसान्त्वय़ेत् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शत्रुं विव्याध विंशत्या स च तं पञ्चभिः शरैः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
शत्रुः प्रवृद्धो नोपेक्ष्यो दुर्वलोऽपि वलीय़सा ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शत्रुः शदेः शासतेः शाय़तेर्वा; शृणातेर्वा श्वय़तेर्वापि सर्गे |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुघ्नं वेगवद्धृष्टो भारसाधनमुत्तमम् |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शत्रुघ्नं समरे क्रुद्धो दृढज्यं वेगवत्तरम् ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ं च वलिनं शक्रलोकं निनाय़ ह ||
१२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ं चन्द्रकेतुं मेघवेगं सुवर्चसम् |
१५ क