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भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ः शत्रुसहः सर्वे क्रुद्धा यशस्विनः |
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ः शत्रुसहश्चित्रश्चित्राय़ुधो दृढः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़श्च विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुञ्जय़ा तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ेन सहितास्तथा दुःशासनेन च |
८ क
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
शत्रुदेहमुपाक्रम्य तं कामं प्राप्नुय़ामहे ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुन्तपं पञ्चभिराशु विद्ध्वा; ततोऽस्य सूतं दशभिर्जघान ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुन्तपः कोपममृष्यमाणः; समर्पय़त्कूर्मनखेन पार्थम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
शत्रुपक्षं समृध्यन्तं यो मोहात्समुपेक्षते |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
शत्रुप्रवीरैरस्तानि नानाशस्त्राणि साय़कैः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
शत्रुभिर्ग्रहणं सङ्ख्ये पुत्रस्य मरणं तथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २३६
जनमेजय़ उवाच
शत्रुभिर्जितवद्धस्य पाण्डवैश्च महात्मभिः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
शत्रुभिर्युध्यमानस्य सङ्ग्रामे त्वस्य धन्विनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
शत्रुभिर्वशमानीतो हीनः स्थानादनुत्तमात् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
शत्रुभिर्वहुभिर्ग्रस्तो यथा वर्तेत पार्थिवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुभिर्विविधैः शस्त्रैः कृत्तदेहा महारणे |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
शत्रुभिर्व्यंसितोपाय़ः कथं नु स जय़ेदरीन् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
शत्रुभिश्चावहसितो मानी पौरुषवर्जितः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
शत्रुमध्ये शरान्मुञ्चन्देवराडशनीमिव ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
शत्रुमानापहो भूत्वा सुहृदां मानकृत्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
शत्रुरर्थहरो मूर्खो न लोकान्प्राप्तुमर्हति ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शत्रुरूपाश्च सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय २७५
व्रह्मो उवाच
शत्रुरेष त्वय़ा वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
शत्रुरेष महावीर्यो वज्रेण निहतो मय़ा ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
शत्रुर्निमज्जता ग्राह्यो जङ्घाय़ां प्रपतिष्यता |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
शत्रुर्मित्रमुखो यश्च जिह्मप्रेक्षी विलोभनः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
शत्रुर्वुद्ध्या सीदते वर्धमानो; वुद्धेः पश्चात्कर्म यत्तत्प्रशस्तम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि वलवत्तरः ||
१३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
शत्रुसंवरणं कृत्वा द्विधा चिच्छेद कार्मुकम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रुसाद्गमय़द्द्रव्यं तद्वुध्यध्वं महारथाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं वलीय़सा |
१८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं वलीय़सा |
२०६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
शत्रुसेनाकलत्रस्य सर्वलोकानदूरतः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
शत्रुसेनाध्वनिं श्रुत्वा तावका ह्यपि नानदन् |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शत्रू चाभिमुखौ दृष्ट्वा दीप्यमानाविवानलौ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रूंश्च विजितान्सर्वान्निर्वृत्तं च प्रय़ोजनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय़ सदा तिष्ठति तोय़दः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
शत्रूञ्जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च प्रतिपालय़ ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
शत्रूञ्जहि प्रजा रक्ष यजस्व क्रतुभिर्नृप |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शत्रूञ्जित्वा यथा शक्रो देवसङ्घैः समावृतः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रूणां कदनं कुर्वञ्जेतासौ दुर्जय़ो युधि ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
शत्रूणां क्षपणे युक्तः प्राप्तकालश्च मे मतः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रूणां ते प्राणहरानित्युक्त्वान्तरधीय़त ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
शत्रूणां पश्यतो दुःखान्मुमूर्षा मेऽद्य जाय़ते ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
पाण्डुरु उवाच
शत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
शत्रूणामभिचारार्थमथर्वसु निदर्शिताः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
शत्रूनेके प्रपद्यन्ते प्रजहत्यपरे पुनः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
शत्रून्न क्षपय़ेच्छक्तो यो न स्याद्गौतमीसुतः ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
शत्रून्निपातय़िष्यामि महावात इव द्रुमान् ||
४० ख